Monday, April 4, 2011

हाथ और हथियार...

हाथ और हथियार...

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भूख़ से कुलबुलाता पेट
हाथ और हथियार की भाषा भूल गया,
नहीं पता किससे छीने
अपना भी ठौर ठिकाना भूल गया !
मर गया था छोटका जब
मार दिया था ख़ुद को तब,
अब तो बस बारी है
पेट की ख़ातिर आग लगानी है !
नहीं चाहिए कोई घर
जहाँ पल-पल जीना था दूभर,
अब तो खून से खेलेगा
अब किसी का छोटका नहीं मरेगा !
बड़का अब भर पेट खाएगा
जोरू का बदन कोई न नोच पाएगा,
छुटकी अब पढ़ पाएगी
हाथ में कलम उठाएगी !
अब तो जीत लेनी है दुनिया
हथियार ने हर ली हर दुविधा,
अब भूख़ से पेट नहीं धधकेगी
आग-आग-आग बस आग लगेगी !
यूँ भी तो मर ही जाना था
सब अपनों की बलि जब चढ़ जाना था,
अब दम नहीं कि कोई उलझे
हाथ में है हथियार
जब तक दम न निकले !

- जेन्नी शबनम (30. 3. 2011)

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