रविवार, 14 नवंबर 2010

189. जाने कैसा लगता होगा...

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बाल दिवस पर एक यतीम बालिका की मनोदशा
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जाने कैसा लगता होगा...

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कैसा लगता होगा
जब किसी घर में
अम्मा-बाबा संग
बिटिया रहती है,
कैसा लगता होगा
जब अम्मा कौर-कौर
बिटिया को खिलाती है,
कैसा लगता होगा
जब बाबा की गोद में
बिटिया इतराती है!

क्या जानूँ वो एहसास
जाने कैसा लगता होगा,
पर सोचती हूँ हमेशा
बड़ा प्यारा लगता होगा,
अम्मा-बाबा की बिटिया का
सब कुछ वहाँ कितना
अपना-अपना-सा होता होगा!

बहुत मन करता है
एक छोटी बच्ची बन जाऊँ,
खूब दौडूँ-उछलूँ-नाचूँ   
बेफ़िक्र हो शरारत करूँ,
ज़रा-सी चोट पर
अम्मा-बाबा की गोद में
जा चिपक उनको चिढ़ाऊँ!

सोचती हूँ
अगर ये चमत्कार
हुआ तो...
बन भी जाऊँ   
बच्ची तो...
अम्मा-बाबा
कहाँ से लाऊँ?
जाने कैसे थे
कहाँ गए वो?
कोई नहीं बताता
क्यों छोड़ गए वो?

सब यतीम यहाँ
कौन किसको समझाए,
आज तो बहुत मिला
प्यार सबका,
रोज़-रोज़ कौन
जतलाये?
यही है जीवन समझ में अब
आ ही जाए!

न मैं बच्ची बनी
न बनूँगी किसी की अपनी,
हर शब यूँ ही तन्हा
इसी दर पर गुज़र जाएगी,
रहम से देखती आँखें सबकी
मेरी खाली हथेली की दुआ ले जायेगी!

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2010)

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शनिवार, 13 नवंबर 2010

188. रचती हूँ अपनी कविता...

रचती हूँ अपनी कविता...

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दर्द का आलम
यूँ ही नहीं होता लिखना
ज़ख़्म को नासूर बना
होता है दर्द जीना,
कैसे कहूँ कि कब
किसके दर्द को जीया
या अपने ही
ज़ख़्म को छील
नासूर बनाया,
ज़िन्दगी हो
या कि मन की
परम अवस्था
स्वयं में पूर्ण समा
फिर रचती हूँ
अपनी कविता!

- जेन्नी शबनम - (12. 11. 2010)
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बुधवार, 10 नवंबर 2010

187. आदमी और जानवर की बात...

आदमी और जानवर की बात...

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रौशन शहर, चहकते लोग
आदमी की भीड़, अपार शोर,
शुभ आगमन की, तैयारी पूरी
रात्रि पहर, घर आएगी समृद्धि !

पर जाने क्या हुआ, कल रात
वो रोते-भौंकते रहे, सारी रात,
बेदम होते रहे, कौन समझे उनकी बात
आदमी तो नहीं, जो कह सके अपनी बात !

कल के दिन, न मिले कोई अशुभ सन्देश
शुभ दिन में श्वान का रोना, है अशुभ संकेत,
पास की कोठी का मालिक, झल्लाता रहा पूरी रात
जाने कैसी विपत्ति आए, हे प्रभु, करना तुम निदान !

पेट के लिए हो जाए, आज का कुछ तो जुगाड़
सुबह से सब शांत, वो निकल पड़े लिए आस,
कोठी का मालिक, अब जाकर हुआ संतुष्ट
शायद आपदा किसी और के लिए, है बड़ा ख़ुश !

अमावास की रात, सजी दीपों की कतार
हर तरफ पटाखों की, गूँजती आवाज़,
भय से आक्रान्त, वो लगे चीखने-भौंकने
नहीं समझ, वो किससे अपना डर कहें !

जा दुबके, उसी बुढ़िया के बिस्तर में
जहाँ वो मिल बाँट, खाते-सोते वर्षों से,
दुलार से रोज़ उनको, सहलाती थी बुढ़िया
सुन पटाखे की तेज़ गूँज, कल ही मर गई थी बुढ़िया !

कौन आज उनको, चुप कराए
कौन आज कुछ भी, खाने को दे,
आज, कचरा भी तो नहीं कहीं
खाली पेट, चलो आज यूँ ही सही !

ममतामयी हाथ, कल से निढ़ाल पसरा
खौफ़ है, और उस खोह में मातम पसरा,
आदमी नहीं, वो थी उनकी-सी ही, उनकी जात
वो समझती थी, आदमी और जानवर की बात !

जब कोई पत्थर मार, उनको करता ज़ख़्मी
एक दो पत्थर खा, पगली बुढ़िया उनको बचाती,
अब तो सब ख़त्म, कल ले जाएँगे यहाँ से आदमी उसको
वो मरें तो जहाँ फेंकते उनको, वहाँ ही कल फेंक देंगे बुढ़िया को !

- जेन्नी शबनम (5. 11. 2010)

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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

186. जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है

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रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है
क़यामत से कब हो सामना, सोच में, वो क़हर ज़ारी है !

मुख़ातिब होते रहे, हर रोज़, फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है !

शिकायत की उम्र बीती, अब सुनाने से क्या फ़ायदा
जल-जल कर दहकता है मन, ताव की लहर ज़ारी है !

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर ज़ारी है !

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे 'शब'
शेष नहीं फिर भी, जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है !

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दहर - ज़िन्दगी / संसार
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- जेन्नी शबनम (4. 11. 2010)

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