Friday, June 22, 2018

575. परवरिश

परवरिश...   

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कहीं पथरीली कहीं कँटीली  
यथार्थ की जमीन बंजर होती है  
जहाँ ख्वाहिशों के फूल उगाना  
न सहज होता है न सरल  
परन्तु फूल उगाना लाजिमी है  
और उसकी खूशबू का बसना भी,  
यही जीवन का नियम है  
और इसी में जीवन की सुन्दरता है।  
वक्त आ चुका है  
जब तुम अपनी ज़मीन पर  
सपनों से सींचकर  
ख्वाहिशों के फूल खिलाओ,  
अपनी दुनिया सँवारो  
और अपनी पहचान बनाओ।  

मुझे नहीं मालूम  
वक्त के कैनवस पर  
हमारे संबंध की तस्वीर कैसी बनेगी  
मेरी तकदीर कैसी होगी।  
आशंकाओं के बादल घुमड़ते रहते हैं मुझमें  
बढ़ती उम्र के साथ अशक्त होने का डर सताता है मुझे  
अकेलेपन का खौफ़ अभी से डराता है मुझे  
यूँ जबकि साथ ही तो रहते हैं हम।  

वह भी तो मेरी ही तरह माँ थी  
जिसने हर वो जतन किए होंगे  
जो संतान की परवरिश के लिए लाजिमी है,  
पर कुछ तो कमी रह गई  
जाने क्यों संवेदनशून्यता आ गई  
तमाम आरजूओं के साथ  
दरवाजे को पथराई आँखों से देखती  
अपनों की राह अगोरती वह माँ  
छह माह की मृत कंकाल बन गई।  
मुमकिन है तुम भी मुझे बिसरा दो  
वक्त के साथ हमारे रिश्ते भूल जाओ  
वो सारे पल भी भूल जाओ  
जब ऊँगली पकड़ कर  
तुम्हे चलना सिखाया  
हाथ पकड़ कर  
तुम्हे लिखना सिखाया  
शब्द-शब्द जोड़ कर  
बोलना सिखाया।  

तुम्हें तो याद ही है  
मैंने बहुत बार बेवजह तुम्हें मारा है  
दूसरों का गुस्सा तुमपर निकाला है  
लेकिन तुम यह नहीं जानते  
जब-जब तुम्हें मारा मैंने  
हर उस रात तुम्हें पकड़कर रोकर गुजारी मैंने,  
कई बार तुम्हारे हाथों को जोर से झिड़का है  
जब एक ही शब्द को बार-बार लिखना सिखाती थी  
और तुम सही-सही लिख नहीं पाते थे  
हर उस रात तुम्हारी नन्ही हथेली को लेकर  
तमाम रात रोकर गुजारी मैंने,  
कामों की भीड़ में तुम्हें खिलाना  
उफ्फ! कितना बड़ा काम था  
कई बार तुम्हें खाने के लिए मारा है मैंने  
और हर उस दिन मेरे मुँह में निवाला न जा सका  
भले सारा काम निपटा लिया मैंने,  
तुम्हारी हर एक ज़िद  
कम में ही सही पर पूरी की मैंने  
एक पल को भी कभी  
तुम्हें अकेला न छोड़ा मैंने।  
हाँ! यह जरूर है  
मेरे पास उन सभी लम्हों का  
कोई सबूत नहीं है  
न मेरे प्यार का न मेरे व्यवहार का  
न उस वक्त का न उन हालात का।  

तुम अपनी कचहरी में  
चाहो तो मुझ पर मुकदमा करो  
चाहो तो सजा दो  
मुझपर इल्जाम है -  
पाप किया मैंने  
तुम्हे क्यों मारा मैंने  
तुम्हें ठीक से न पाला मैंने।  
पाप पुण्य का फैसला तुम ही करो  
मैं बस खामोश हूँ।  

वक्त की कोख में  
मेरे अंत की तस्वीर बन रही होगी  
आत्मा के लिए राह बिछ रही होगी  
नहीं मालूम सिर्फ काँटे ही मिलेंगे या फूल भी  
पर जिस राह से भी गुजरूँगी  
जहाँ भी पहुँचुँगी  
बस दुआ ही करूँगी।  
जानते हो न  
माता कभी कुमाता नहीं होती।  

- जेन्नी शबनम (22. 6. 2018)  
(पुत्र के 25 वें जन्मदिन पर)  
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