Monday, July 26, 2010

158. विदा अलविदा... / vida alvida...

विदा अलविदा...

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कुछ लम्हे साथ जीती
ये कैसी ख़्वाहिश होती,
दूर भी तो न हुई कभी
फिर ये चाह क्यों होती !

ख़त में सुने उनके नगमें
पर धुन पराई है लगती,
वो निभाते उम्र के बंधन
ज़िन्दगी यूँ नहीं ढ़लती !

इश्क में मिटना लाज़िमी
क्यों है ये दस्तूर ज़रूरी,
इश्क में जीना ज़िन्दगी
कब जीता कोई ज़िन्दगी !

विदा अलविदा की कहानी
रोज़ कहते वो मुँह ज़ुबानी,
कल अलविदा मैं कह गई
फिर समझे वो इसके मानी !

हिज़्र की एक रात न आई
न वस्ल ने लिखी कहानी,
'शब' ओढती रोज़ चाँदनी
पर रात अमावास की होती !

- जेन्नी शबनम (19. 7. 2010)

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vida alvida...

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kuchh lamhe saath jiti
ye kaisi khwaahish hoti,
door bhi to na hui kabhi
phir ye chaah kyon hoti !

khat mein sune unke nagmein
par dhun paraai hai lagti,
vo nibhaate umrra ke bandhan
zindagi yun nahin dhalti !

ishq mein mitna laazimi
kyon hai ye dastoor zroori,
ishq mein jina zindagi
kab jita koi zindagi !

vida alvida ki kahaani
roz kahte vo moonh zubaani,
kal alvida main kah gai
phir samjhe vo iske maani !

hizrra ki ek raat na aai
na vasl ne likhi kahaani,
'shab' odhti roz chaandni
par raat amaavas ki hoti !

- jenny shabnam (19. 7. 2010)

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