Thursday, March 19, 2009

38. हम अब भी जीते हैं

हम अब भी जीते हैं

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इश्क की हद, पूछते हैं आप, बारहा हमसे
क्या पता, हम तो हर सरहदों के पार, जीते हैं । 

इश्क की रस्म से अनजान, आप भी तो नहीं
क्या कहें, हम कहाँ कभी ख्वाबों में, जीते हैं । 

इश्क की इन्तेहा, देख लीजिए आप भी
क्या हुआ गर, जो हम फिर भी, जीते हैं । 

इश्क में मिट जाने का, अब और क्या अंदाज़ हो
क्या ये कम नहीं, कि हम, अब भी जीते हैं । 

- जेन्नी शबनम (मार्च 19, 2009)

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37. ख़ुद को बचा लाई हूँ (क्षणिका)

ख़ुद को बचा लाई हूँ (क्षणिका)

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कुछ टुकड़े हैं, अतीत के
रेहन रख आई हूँ
ख़ुद को, बचा लाई हूँ । 

साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको
लो, सँभाल लो अब
ख़ुद को, जितना बचा पाई हूँ । 

- जेन्नी शबनम (मार्च 18, 2009)

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