सोमवार, 27 जनवरी 2020

644. बेफिक्र धूप (ठंड पर 10 हाइकु)

बेफिक्र धूप 
(ठंड पर 10 हाइकु)   

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1.   
ठठ्ठा करता   
लुका-चोरी खेलता   
मुआ सूरज।   

2.   
बेफिक्र धूप   
इठलाती निकली   
मुँह चिढ़ाती।   

3.   
बिफरा सूर्य   
मनाने चली हवा   
भूल के गुस्सा।   

4.   
गर्म अँगीठी   
घुसपैठिया हवा,   
रार है ठनी।   

5.   
ठिठुरा सूर्य   
अलसाया-सा उगा   
दिशा में पूर्व।   

6.   
धमकी देता   
और भी पिघलूँगा,   
हिम पर्वत।   

7.   
डर के भागा   
सूरज बचकाना,   
सर्द हवाएँ।   

8.   
वक्त चलता   
खरामा-खरामा-सा   
ठंड के मारे।   

9.   
जला जो सूर्य   
राहत की बारिश,   
मिजाज स्फूर्त।   

10.   
शातिर हवा   
चुगली है करती   
सूर्य बिदका।   

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2020)   



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गुरुवार, 23 जनवरी 2020

643. एक शाम ऐसी भी

एक शाम ऐसी भी 

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एक शाम ऐसी भी, एक मुलाकात ऐसी भी   
बहुत-बहुत खास जैसी भी   
जीवन का एक रंग यह भी, जीवन का एक पड़ाव यह भी   
एक सुख ऐसा भी और एक भाव यह भी,   
खाली सड़क पर दो मन, एक हाथ की दूरी पर दोनो मन   
और ये दूरी भी मिटाने का जतन   
आत्मीयता में डूबे मन, बतकही करते दोनों मन   
और बहुत कुछ अनकहा समझने का प्रयत्न,   
न सिद्धांत की बातें न संस्कृति पर चर्चा   
न समाज की बातें न सरोकारों पर चर्चा   
न संताप की बातें न समझौतों पर चर्चा   
न संघर्ष की बातें न संयमो पर चर्चा   
पर होती रही बेहद लम्बी परिचर्चा,   
न शब्दों का खेल, न आश्वासनों का खेल
न अनुग्रह कोई, न भावनाओं का मेल     
न कोई कौतुहल न कोई व्यग्रता   
धीमे-धीमे बढ़ते कदम बिना किसी अधीरता   
समय भी साथ चला हँसता-गाता-झूमता,   
कॉफी की गर्माहट नसों में घुल रही जरा-जरा   
मीठे पान-सी लाली चेहरे पर जरा-जरा   
ठंडी रात है और बदन में ताप जरा-जरा   
जिंदगी हँस रही है आज जरा-जरा   
खाली जीवन भी आज जैसे भरा-भरा।   

- जेन्नी शबनम (20. 1. 2020)   

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सोमवार, 13 जनवरी 2020

642. प्यार करते रहे

प्यार करते रहे 

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तुम न समझे फिर भी हम कहते रहे   
प्यार था हम प्यार ही करते रहे !   

छाँव की बातें कहीं, और चल दिए   
जिंदगी की धूप में जलते रहे !   

तुम न आए जब, जहां हँसता रहा   
जिंदगी रूठी औ हम ठिठके रहे !   

चैन दमभर को न आया था कभी   
और तुम कहते हो, हम हँसते रहें !   

बेवफ़ाई तुमसे है जाना, मगर   
हम वफ़ा के गीत ही रचते रहे !   

ढल गई शब, अब सहर होने को है   
सोच के साये से हम लड़ते रहे !   

बारहा तुमने हमें टोका मगर   
अपनी धुन में गीत हम कहते रहे !   

आए तुम आकर भी कब के जा चुके   
हम सफर तन्हा मगर करते रहे !   

अबके जो जाओ, तो आना मत सनम   
हम तुम्हारे बिन भी अब रहते रहे !   

सौ जनम ‘शब‘ ने जिए हैं आज तक   
इस जनम में बोझ क्यों कहते रहे !   

- जेन्नी शबनम (13. 1. 2020)   

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बुधवार, 1 जनवरी 2020

641. जो देखा जो सुना

जो देखा जो सुना   

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जो देखा जो सुना   
जो जिया जो गुना   
वह लिखा वह सब लिखा   
जो मन ने कहा   
जो मन में पला   
वह लिखा बस वही लिखा   
कब कौन सी विधा हुई   
किस तराजू पे परखी गई   
किस नियम में सजी लेखनी   
वो त्रिभुज हुई या वृत्ताकार बनी   
समीप रही या समानांतर चली   
नहीं मालूम यह क्या हुआ   
नहीं मालूम यह क्यों हुआ   
बस हुआ और इतना हुआ   
जो समझा जो पहचाना   
वह लिखा वह सब लिखा।   

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2020)   

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