Saturday, February 28, 2009

31. चुप (क्षणिका)

चुप (क्षणिका)

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एक सब्र मन का
उतर गया है आँखों पर,
एक सब्र बदन का
ओढ़ लिया है ज़िन्दगी पर,
एक चुप पी ली है
अपने होंठों से,
एक चुप चुरा ली है
अपनी ज़िन्दगी से । 

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 25, 2009)

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Thursday, February 26, 2009

30. लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त...

लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त...

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लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त
सिर्फ़ तुम्हारे लिए, मेरा ख़त 
मेरी स्याही मेरे ज़ख्मों से रिसती है
जिससे तुम्हारे मन पे मैंने तहरीर रची है   

हर ज़ज्बात मेरे, कुछ एहसास-ए-बयाँ करते हैं
ज़माना ना समझे, इसीलिए तो तुम्हीं से कहते हैं 
तुम्हारी नज़रें हर हर्फ़ में ख़ुद को तलाश रही है
यकीन है, मेरी हर इबारत तुमसे कुछ कह रही है । 

जब कभी मेरे ख़त ना पहुँचे, आँखें नम कर लेना
शायद अब निजात मिली मुझे, सब्र तुम कर लेना 
समझना, मेरी रूह को जमानत मिल गई
ख़ुदा से रहम और रिहाई की मंजूरी, मुझे मिल गई । 

मेरे तुम्हारे बीच मेरे ख़त ही तो, सिर्फ़ एक ज़रिया है
मैं ना रही अब, ये बताने का बस यही, एक ज़रिया है 
चाहे जितने तुम पाषाण बनो, थोड़ा तुम्हें भी रुलाना है
नहीं आऊँगी फिर कभी, जश्न मुझे भी तो मनाना है । 

मैं फिर भी रोज़ एक ख़त लिखूँगी
चाहे जैसे भी हो तुम तक पहुँचा दूँगी । 
ये एक नयी आदत तुम पाल लेना
हवाओं में तैरती मेरी पुकार तुम सुन लेना 
ठंडी बयार जब चुपके से कानों को सहलाए
समझना मैंने तुम्हें अपने ख़त सुनाए । 

मेरे हर गुज़रे लम्हे और ख़त अपने सीने में दफ़न कर लेना
सफ़र पूरा कर जब तुम आओ, मुझे उन ख़तों से पहचान लेना 
कभी ख़त जो न लिख पाऊँ, ताकीद तुम करना नहीं
मान लेना
पुराना ज़ख्म पिघला नहीं
और नया ज़ख्म अभी जमा नहीं । 

लिखूँगी रोज़ मैं एक ख़त
सिर्फ़ तुम्हारे लिए मेरा ख़त !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 16, 2008)

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29. नफ़रत के बीज... काश ! ऐसा होता...

नफ़रत के बीज... काश ! ऐसा होता...

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नफ़रत के बड़े-बड़े पेड़ उगे हैं हर कहीं
इंसान के अलग-अलग रूपों में । 
ये बीज हमने कब बोए ?

सोचती हूँ...
ख़ुदा ने ज़मीन पर आदम और हव्वा को भेजा
उनके वर्जित फल खाने से इंसान जन्मा,
वो वर्जित फल
उन्होंने भूख के लिए खाया होगा
लड़कर आधा-आधा
न कि मनचाही संतान के लिए
प्रेम से आधा-आधा । 

शायद उनके बीच जब तीसरा आया हो
उन्हें नफ़रत हो गई हो उससे । 
और इसी नफ़रत से इंसान के चेतन-अचेतन मन में बस गया है -
ईर्ष्या, द्वेष, आधिपत्य, बदला, दुश्मनी,
हत्या, दुराचार, घृणा, क्रोध, प्रतिशोध । 

नफ़रत की ही इन्तेहा है
जब इसकी हद इंसानी रिश्तों को पार कर
सियासत, मुल्कों, कौमों, तक जा पहुँची । 
पहले बीज से अनगिनत पौधे बनते गए
हर युग में नफ़रत के पेड़ फैलते गए । 

सतयुग, द्वापर, त्रेता हो या कलियुग
ऋषिमुनि-दुराचारी, राजाओं-रंकों, देवी-देवताओं
सुर-असुर, राम-रावण, कृष्ण-कंस, कौरव-पांडव
से लेकर आज तक का
जाति, वर्ण और कौमी विभाजन
औरत मर्द का मानसिक विभाजन
दैविक शक्तियों से लेकर हथियार
और अब परमाणु विभीषिका । 

हम कैसे कहें
कि नफ़रत हमने आज पैदा की । 
हमने सदियों युगों से नफ़रत के बीज को
पौधों से पेड़ बनाया
उन्हें जीवित रहने और जड़ फैलाने में
सहूलियत और मदद दी,
जबकि हमें
उन्हें जड़ से उखाड़ फेंकना था । 

सोचती हूँ
ख़ुदा ने आदम और हव्वा में
पहले चेतना दी होती
और उस वर्जित फल को खिलाकर
मोहब्बत भरे इंसान से संसार बसाया होता । 

सोचती हूँ
काश ! ऐसा होता !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 14, 2008)

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28. शायर...

शायर...

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शायर के अल्फ़ाज़ में
जाने किसकी रूह तड़पती है
हर हर्फ़ में जाने कौन सिसकता है
ख़्वाबों में जाने कौन पनाह लेता है

किसका अफ़साना लिए वो लम्हा-लम्हा जलता है
किसका दर्द वो अपने लफ्ज़ों में पिरोता है
किसका जीवन वो यादों में पल-पल जीता है

शायद ज़ज्बाती है, रूहानी है, वो इंसान है
शायद मासूम है, मायूस है, वो बेमिसाल है
इसीलिए तो गैरों के आँसू अपने शब्दों से पोछता है
और दुनिया का ज़ख्म सहेजकर शायर कहलाता है । 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 5, 2008)

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27. मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी...

मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी...

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आज मैं कोरा कागज बनूँगी
या कैनवास का रूप धरुँगी,

आज किसी के कलम की स्याही बनूँगी
या इन्द्रधनुष-सी खिलूँगी,

आज कोई मुझसे मुझपर अपना गीत लिखेगा
या मुझसे मुझपर अपना रंग भरेगा,

आज कोई मुझसे अपना दर्द बाँटेगा
या मुझपर अपने सपनों का अक्स उकेरेगा,

आज किसी के नज़्मों में बसूँगी
या किसी के रूह में पनाह लूँगी,

आज कोई पुराना नाता पिघलेगा
या कोई नया ग़म निखरेगा,

आज किसी पर पहला ज़ुल्म ढ़ाऊँगी,
या अपना आख़िरी ज़ुर्म करुँगी,

आज कोई नया इतिहास रचेगा
या मैं उसके सपने रँगूँगी,

आज किसी के दामन में अपनी अंतिम साँस भरूँगी
या खुद को बहाकर उसके रक्त में जा पसरूँगी,

आज ख़ुद को बिखराकर ग़ज़लों की किताब बनूँगी
या आज ख़ुद को रँगकर उस ग्रन्थ को सँवार दूँगी,

मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी !
मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 8, 2008)

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Wednesday, February 25, 2009

26. ख़ुदा की नाइंसाफी...

ख़ुदा की नाइंसाफी...

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ख़ुदा ने बनाए थे दो इंसान, औरत और मर्द दो ही जात
सब कुछ बाँटना था आधा-आधा, जी सकें प्यार से जीवन पूरा,
पर ख़ुदा भी तो मर्द जात था, नाइंसाफी वो कर गया
सुख-दुःख के बँटवारे में, बेईमानी वो कर गया 

जिस्म और ताक़त का मसला
क्यों उसके समझ से परे रहा ?
औरत को जिस्म और ज़ज्बात दिया
बुत बन जाने की किस्मत दी,
मर्दों को ताक़त और तक़दीर दी
हुकूमत करने को राज दिया 

ऐ ख़ुदा,
मर्द की इस दुनिया से बाहर निकल
ख़ुदा नहीं इंसान बन कर इस जहान को देख !

क्यों नहीं काँपती, रूह तुम्हारी ?
जब तुम्हारी बसाई दुनिया की औरत
बिलखती है,
युगों से तड़पती कराह रही
ख़ामोशी से सिसकती
ज़ख्म सिल रही 

ऐ ख़ुदा,
तुम मंदिर-मस्जिद-गिरिजा में बँटे, आराध्य बने बैठे हो
नासमझों की भीड़ में मूक बने, सदियों से तमाशा देखते हो !

क्या तुम्हे दर्द नहीं होता ?
जब अजन्मी कन्या मरती है
जब नयी ब्याहता जलती है
जब नारी की लाज उघड़ती है
जब स्त्री की दुनिया उजड़ती है
जब औरत सावालों की जिंदगी से घबड़ाकर
मौत को गले लगाती है 

ऐ ख़ुदा,
मैं मगरूर ठहरी, नहीं पूजती तुमको
तो मेरी न सुनो, कोई बात नहीं !

उनकी तो सुनो
जो तुमसे आस लगाए, युगों से पूजते हैं,
तुम्हारे सज़दे में करोड़ों सिर झुके हैं
जो तुम्हारे अस्तित्व की रक्षा में, जान लेते और गँवाते हैं 

ऐ ख़ुदा,
क्या तुम संवेदन-शून्य हो, या अस्तित्वहीन हो ?
तुम्हारी आस्था में लोग भ्रमित और चेतना-विहीन हो गए हैं 
क्या समझूँ, किसे समझाऊँ, कैसे कराऊँ ?
तुम्हारे पक्षपात और निरंकुशता का भान !

मेरे मन का द्वंद्व दूर हुआ, समझ गई तुम्हारा रूप
तुम कोई उद्धारक नहीं, और न हो शक्ति के अवतार
धर्म-ग्रंथों के हो तुम
बस पात्र मात्र !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 7, 2008)

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25. अधूरी कविता...

अधूरी कविता...

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तुम कहते -
सुनाओ कुछ अपनी कविता,
कैसे कहूँ
अब होती नहीं पूरी, मेरी कविता 

अधूरी कविता अब बन गई ज़िन्दगी
जैसे अटक गए हों लफ्ज़, ज़ुबाँ पे,
उलझी-उलझी बातें हैं
कुछ अनकहे अफ़साने हैं
दर्द के गीत और पथरीली राहें हैं 

तुम क्या करोगे सुन मेरी कविता ?
क्या जोड़ोगे कुछ अल्फ़ाज़ नए
ताकि कर सको पूरी, मेरी कविता 

तुम वो दर्द कहाँ ढूँढ़ पाओगे ?
तुम बेइंतेहा प्रेम की प्यास कैसे जगाओगे ?
अपनी आँखों से मेरी दुनिया कैसे देखोगे ?
मेरी ज़िन्दगी का अहसास कहाँ कर पाओगे ?

ज़िद करते हो
तो सुन लो, मेरी आधी कविता 
ज़िद ना करो
पढ़ लो, आधी ही कविता 

गर समझ सको ज़रा भी तुम
मेरी आधी-अधूरी कविता,
वाह-वाही के शब्द
न वारना मुझ पर
ज़ख्मों को मेरे
यूँ न उभारना मुझपर 

पलभर को मेरी रूह में समा
पूर्ण कर दो मेरी कविता 
तुम जानते तो हो
मेरी अधूरी ज़िन्दगी ही है
मेरी अधूरी कविता 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 4, 2008)

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24. थक गई मैं...

थक गई मैं...

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वादा किया था
उम्र भर का साथ निभाने को,
लम्हों का सफ़र
और रुसवा हो गया था वो,
जाने ये वादाखिलाफ़ी थी
या अंत करीब मेरा,
और डर गया था वो 

एक पाँव जीवन की दहलीज़ पे
दूसरा पाँव मौत की सरहद पे
आज साथ सफ़र ख़त्म करती अपना 

जीते हुए मौत का सफ़र देखा
शुक्रिया ख़ुदा !
अब तो जीने मरने के खेल से उबार मुझे
ओ ख़ुदा 

ओ ख़ुदाया,
तुम्हारे साथ सारे युग घुम आयी
मैं तो थक गई
जाने तू क्यों न थका ?

एक बार मेरी आत्मा में समा
और मेरी नज़र से देख
तू सहम न गया तो
ऐ ख़ुदा, तेरी कसम
एक और जन्म कुबूल हमें !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 3, 2008)

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23. रात का नाता मुझसे...

रात का नाता मुझसे...

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मेरी कराह का नाता है
रातों से
जाने कितना गहरा
ख़ामोशी से सुनती और साथ मेरे जागती है 

हौले से थाम मेरी बाहें
सुबह होने तक
साथ मेरे रोती है,
आँसुओं से तर मेरी रूह को
रात अपने आगोश में पनाह देती है,
कभी थपकी दे
ख़ुद जाग
हमें सुला देती है,
मेरी दास्ताँ
रात अपने अँधियारे में छुपा लेती है 

जाने ये कैसा नाता है ?
क्यों वो इतने करीब है ?
रात की बाँहों में कहीं चाँदनी
कहीं लाखों सितारे
फिर क्यों, बिसरा कर ये रूहानी बातें
संग आ जाती, मेरे मातम में, ये रातें 

कुछ तो गहरा नाता है
मेरी तरह वो भी पनाह ढूँढ़ती शायद
मेरी तरह अकेली उदास शायद,
इसी लिए एक दूसरे को ढ़ाढ़स देने
रोज चुपके से आ जाती रातें,
मिल बाँट दुःख-दर्द अपना
बसर होती संग रातें 

रात का नाता मुझसे
सुबह की किरणों संग
हँसना है 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 2, 2008)

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22. मुहब्बत... पहला लफ़्ज़...

मुहब्बत... पहला लफ़्ज़...

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मुहब्बत ही था पहला लफ़्ज़, जो कहा तुमने
अजनबी थे, जब पहली ही बार हम मिले थे ।
कुछ भी साथ नहीं, क्षत-विक्षत मन था
जाने कब-कब, कहाँ-कहाँ, किसने तोड़ा था ।

सारे टुकड़ों को, उस दिन से समेट रही
आख़िर किस टुकड़े से कहा था तुमने, सोच रही ।

रावण के सिर-सा, मेरे मन का टुकड़ा
बढ़ता जा रहा, फैलता जा रहा ।
अपने एक साबुत मन को, तलाशने में
जिस्म और वक़्त थकता जा रहा ।

तुम्हीं ढूँढ़ दो न, मैं कैसे पहचानूँ ?
ख़ुद को भी भूल चुकी, अब मैं क्या करूँ ?

तुम्हें तो पहचान होगी न उसकी
तुम्हीं ने तो देखा था उसे पहली बार ।
हज़ारों में से एक को पहचाना था तुमने
तभी तो कहा था तुमने, मुहब्बत का लफ़्ज़, पहली बार ।

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 24, 2009)

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Tuesday, February 24, 2009

21. घर...

घर ...

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शून्य को ईंट-गारे से घेर
घर बनाना एक भ्रम ही तो है,
बेजान दीवारों से घर नहीं
महज़ आशियाना बनता है,
घरों को मकान बनते देखा है अक्सर
मकान को घर बनते ख्वाबों सा लगता अक्सर 

न राम-सीता का घर बसा कभी
वरना गैर के आरोप से घर न टूटता कभी,
न कृष्ण का घर बसा कभी
वरना हजारों रानियों पटरानियों से महल न सजता कभी,
न राजमहलों को घर बनते सुना कभी
वरना रास-रंग न गूँजता कभी 

देखा है कभी-कभी यूँ ही
किसी फुटपाथ पर घर बसते हुए
फटे चिथड़ों और टूटी बरसाती से घर सजते हुए
रिश्तों की आँच और अपनेपन की छाँव से घर सँवरते हुए 

ईंट की अँगीठी पर सूखी रोटी सेंकती मुस्कुराती औरत
टूटी चारपाई पर अधनंगे बच्चे की किलकारी
थका-हारा पस्त, पर ठहरा हुआ इंसान
उनका अटूट बंधन जो ओट देता हर थपेड़े से
और बस जाता है एक घर 

झोपड़ी-महल का फ़र्क नहीं
न ही ईंट-पत्थरों का है दोष,
जज़्बात और यकीन की बुनियाद हो तो
यूँ ही किसी वीराने में
या आसमान तले
बस जाता है घर 

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 14, 2009)

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20. अच्छा हुआ तुम न आए...

अच्छा हुआ तुम न आए...

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अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें,
सदा पास रहने की
साथ जीने की 

तुम्हारा न आना
अच्छा तो न लगा,
पर अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें 

तुम्हें दूर जाना था
हमें जीना था,
तुम बताओ
बिना दर्द, कोई जीता है क्या ?
अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें 

कितने जन्मों का साथ है ?
कब तक मेरे साथ होते तुम ?
अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें 

इस जीवन से मुक्ति पाना है
गर तुम आते
तो फिर एक बहाना जीने का,
अच्छा हुआ जो तुम न आए
आदत थी तुम्हारी हमें 

तुम वापस न आओ
जाओ कभी न आओ,
जीने दो हमें अपने संग
बिना तुम्हारी आदत !

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 22, 2009)

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19. अनुत्तरित प्रश्न है (क्षणिका)

अनुत्तरित प्रश्न है (क्षणिका)

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अनुत्तरित प्रश्न है -
अहमियत क्या है मेरी ?
कच्चा गोश्त हूँ, पिघलता जिस्म हूँ
बेजान बदन हूँ, भटकती रूह हूँ
या किसी के ख़्वाहिशों की बुत हूँ ?
क्या कभी किसी के लिए इंसान हूँ ?

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 21, 2009)

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18. मेरी आजमाइश करते हो

मेरी आजमाइश करते हो

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गैरों के सामने इश्क की नुमाइश करते हो
क्यों भला ज़िन्दगी की फरमाइश करते हो ?

इश्क करते नहीं ईमान से तुम
और ख़ुद ही ख़ुदा से नालिश करते हो !

गैरों की जमात के तुम मुसाफिर हो
अपनों में आशियाँ की गुंजाइश करते हो !

ज़ख्म गहरा देते हो हर मुलाकात के बाद
और फिर भी मिलने की गुज़ारिश करते हो !

इक पहर का साथ तो मुमकिन नहीं
मुकम्मल ज़िन्दगी की ख़्वाहिश करते हो !

तुम्हे तो आदत है बेवफाई करने की
और 'शब' की वफ़ा की आजमाइश करते हो !

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 16, 2009)

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17. मेरा अपना कुछ...

मेरा अपना कुछ...

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मेरा अपना एक टुकड़ा सूरज-चाँद है
एक कतरा धरती-आसमान है,
कुछ छींटे सुर्ख उजाले
कुछ स्याह अँधियारे हैं,
कुछ ख़ुशी के नग्मे
कुछ दास्ताँ ग़मगीन हैं,
थोड़े नासमझी के हश्र
थोड़े काबिलियत के दंभ हैं 

मुझे अपनी कहानी लिखनी है
इन 'कुछ' और 'थोड़े' जो मेरे पास हैं,
मुझे अपनी ज़िन्दगी जीनी है
ये 'अपने' जो मेरे साथ हैं 

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 20, 2009)

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Wednesday, February 18, 2009

16. सुलगती ज़िन्दगी...

सुलगती ज़िन्दगी...

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मेरी नसों में लहू बनकर
इक दर्द पिघलता है,
मेरी साँसों में ख़ुमार बनकर
इक ज़ख्म उतरता है,
इक ठंडी आग है
समाती है सीने में मेरे धीरे-धीरे,
और उसकी लपटें
जलाती है ज़िन्दगी मेरी धीमे-धीमे,
न राख है न चिंगारी
पर ज़िन्दगी है कि
सुलगती ही रहती है 

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 17, 2009)

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Wednesday, February 11, 2009

15. ज़िन्दगी रेत का महल...

ज़िन्दगी रेत का महल...

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ज़िन्दगी रेत का महल है
हर लहर आकर बिखेर जाती है,
सपनों से रेत का महल हम फ़िर बनाते हैं
जानते हैं बिखर जाना है फ़िर भी !

हमारी मौज़ूदगी के निशान तो रेत पे न मिलेंगे कभी
किसी के दिल में चुपके से इक हूक-सी उठेगी कभी,
ज़ख्म तो पाया हर पग पर हमने
पर टीस उठेगी ज़रूर सीने में किसी के !

रेत के महल-सा स्वप्न हमारा
क्या मुमकिन कि समंदर बख्श दे कभी ?
जीवन हो या रिश्ता, वक्त की लहरों से बह तो जाना है ही
फ़िर भी सहेजते हैं रिश्ते, बनाते हैं रेत से महल !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 19, 2008)

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14. तुमने सब दे दिया...

तुमने सब दे दिया...

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एक इम्तहान-सा था, कल जो आकर गुज़र गया
वक़्त भी मुस्कुराया, जब तुमने मुझे जिता दिया !

एक वादा था तुम्हारा, कि सँभालोगे तुम मुझको
लड़खड़ाए थे कदम मेरे, तुमने निभा दिया !

दहकता रहा मेरा जिस्म, पर तुम न जल सके
मेरे मन का विश्वास, तुमने पुख्ता कर दिया !

रिश्ते तो हैं ऐसे, जैसे नहीं हम इस सदी के
कुछ ख्वाब था हमारा साँझा, तुमने सब मुझे दे दिया !

- जेन्नी शबनम (फ़रवरी 9, 2009)
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13. ज़ब्त-ए-ग़म...

ज़ब्त-ए-ग़म...

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सुर्ख स्याही से सफ़ेद पन्नों पर
लिखी है किसी के ज़ब्त-ए-ग़म की तहरीर 

शब्द के सीने में ज़ब्त है
किसी के जज़्बात की जागीर 

दफ़न दर्द को कुरेद कर
गढ़ी गई है किताब रंगीन 

बड़े जतन से सँभाल रखी है
किसी के अंतर्मन की तस्वीर 

इजाज़त नहीं ज़माने को कि
बाँच सके किसी की तकदीर 

हश्र तो ख़ुदा जाने क्या हो
जब कोई तोड़ने को हो व्याकुल ज़ंजीर 

नतीजा तो कुछ भी नहीं बस
संताप को मिल जाएगी इक ज़मीन 

दर्द और ज़ख्म से जैसे
रच गई ज़ब्त-ए-ग़म की कहानी हसीन 

गर रो सको तो पढ़ो कहानी
टूटी-बिखरी दफ़न है किसी की मुरादें प्राचीन 

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 9, 2008)

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12. संतान की आहुति...

संतान की आहुति...

[ये कोई कविता नही है, बस यूँ ही सोचने के लिए प्रेषित एक लेखनी है...
परिवार द्वारा अपनी संतान का कत्ल कर देना क्योंकि उसने प्रेम करने का गुनाह किया 
मनचाही ज़िन्दगी जीने की सज़ा क्या इतनी क्रूरता होती है ?
प्रेम पाप हो चुका शायद, तो कोई ईश्वर से भी प्रेम न करे...]

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प्रेम के नाम पे आहुति दी जाती
प्रेम के लिए बलि चढ़ती,
कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि
वो वही संतान है
जो मुरादों से मिली
एक माँ के खून से पनपी
प्रेम की एक दिव्य निशानी है 

एक आँसू न आए हज़ार जतन किए जाते
हर ख़्वाहिश पे दम भर लुटाए जाते
दुनिया की खुशी वारी जाती
एक हँसी पे सब कुर्बान होते 

गर संतान अपनी मर्ज़ी से जीना चाहे
अपनी सोच से दुनिया देखे
अपनी पहचान की लगन लगे
अपने ख़्वाब पूरा करने को हो प्रतिबद्ध
फ़िर वही संतान बेमुराद हो जाती
जो दुआ थी कभी अब बददुआ पाती
घर का चिराग कलंक कहलाता
चाहे दुनिया वो रौशन करता 

इन्तेहा तो तब जब
मनचाहा साथी की ख़्वाहिश
पूरी करती संतान 

समान जाति तो फ़िर भी कुबूल
संस्कारों से ढाँप, जगहँसाई से राहत देता परिवार
पर तमाम उम्र जिल्लत और नफ़रत पाती संतान 

गैर जाति में मिल जाए जो मन का मीत
घर से तिरस्कृत और बहिष्कृत कर देता परिवार
अपनों के प्यार से आजीवन महरूम हो जाती संतान 

धर्म से बाहर जो मिल जाए किसी को अपना प्यार
मानवता की सारी हदों से गुज़र जाता परिवार 

कथित आधुनिक परिवार हो अगर
इतना तो संतान पे होता उपकार
रिश्तों से बेदख़ल और जान बख्श का मिलता वरदान 

खानदानी-धार्मिक का अभिमान, करे जो परिवार
इतना बड़ा अनर्थ... कैसे मिटे कलंक...
दे संतान की आहुति, बचा ली अपनी भक्ति 

हर खुशी पूरी करते, जीवन की खुशी पे बलि चढ़ाते
इज्ज़त की गुहार लगाते, संतान के खून से अपनी इज्ज़त बचाते,
प्रेम से है प्रतिष्ठा जाती, हत्यारा कहलाने से है प्रतिष्ठा बढ़ती
जाने कैसा संस्कारों का है खेल, प्रेम को मिटा गर्वान्वित होते 

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 8, 2008)

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11. मेरी बिटिया का जन्मदिन... (जनवरी 7, 2009)

मेरी बिटिया का जन्मदिन (जनवरी 7, 2009)

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मेरी बिटिया का जन्मदिन आया, स्वर्णिम सुहाना नया सवेरा लाया
जन्म दिन मनाने सूरज आया, सर्दी और नर्म धूप साथ है लाया
मैंने खूब बड़ा एक केक मँगाया, गुब्बारों से घर है सजाया
सगे-सम्बन्धी सब अपनों ने आशीष दिए, सबने मिलकर जश्न मनाया !

झूमती गाती 'ख़ुशी' मचलती, दोस्तों संग है धूम मचाती
हर दिन खूब है इठलाती सँवरती, 'तितली'-सी है आज उड़ती फिरती
नए कपड़े पहन फूलों-सी खिलती, बड़ी अदा से 'कुकू'-सी चहकती
खूब सजी मासूम-सी इतराती, मेरी बिटिया प्यारी है दिखती !

खुशियों से दामन सदा भरा रहे, युगों तक चमके तेरा नाम
जन्म-जन्मान्तर तक यूँ ही दमके, रौशन रहे सदा तेरा नाम
तू जिए यूँ ही वर्षों हज़ार, सुखों से भरा रहे तेरा भण्डार
तू मुस्कुराए यूँ ही उम्र तमाम, मैं ना रहूँ पर रहेगा सदा मेरा प्यार !

- जेन्नी शबनम (जनवरी 7, 2009)
[ मेरी बेटी परान्तिका के जन्मदिन पर मेरा शुभकामना संदेश ]
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