Friday, July 1, 2011

तुम्हारे सवाल...

तुम्हारे सवाल...

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न तो सवाल बनी तुम्हारे लिए कभी
न ही कोई सवाल की तुमसे कभी,
फिर क्यों हर लम्हों का हिसाब माँगते?
फिर क्यों उगते हैं नए-नए सवाल तुममें?

कहाँ से लाऊँ उनके जवाब
जिसे मैंने सोचा ही नहीं,
कैसे दूँ उन लम्हों का जवाब
जिन्हें मैंने जिया ही नहीं|

मेरे माथे की शिकन की वजह पूछते हो
मेरे हर आँसुओं का सबब पूछते हो,
अपने साँसों की रफ्तार का जवाब कैसे दूँ?
अपने हर गुज़रते लम्हों का हिसाब कैसे दूँ?

तुम्हारे बेधते शब्दों से
आहत मन के आँसुओं का क्या जवाब दूँ?
तुम्हारी कुरेदती नज़रों से
छलनी वज़ूद का क्या जवाब दूँ?

बिन जवाबों के तुम मेरी औकात बताते हो
बिन जवाबों के तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं अपनाती हूँ,
फ़िर क्या बताऊँ कि कितना चुभता है तुम्हारा ये अनुत्तरित प्रश्न
फ़िर क्या बताऊँ कि कितना टूटता है तुम्हारे सवालिया आँखों से मेरा मन|

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 10, 2008)

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