Wednesday, July 20, 2011

एक चूक मेरी...

एक चूक मेरी...

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रास्ते पर
चलते हुए
मैं उससे टकरा गई,
उसके हाथ में पड़े सभी
फलसफे
गिर पड़े
जो मेरे लिए ही थे,
सभी टूट गए
और मैं
देखती रही । 
उसने कहा
ज़रा सी चूक
तमाम जीवन की सज़ा बन गई तुम्हारी,
तुम जानती हो कि उचित क्या है
क्योंकि तुमने देखा है उचित फलसफे,
जो जन्म के साथ तुम्हें मिलने थे
जिनके साथ तुम्हें जीना था,
पर...
अडिग रहने का साहस
अब तुममे न होगा,
जाओ
और बस जीयो
उन सभी की तरह
जो बिना किसी फलसफे के जीते
और मर जाते हैं,
बस एक फ़र्क होगा कि
तुम्हें पता है तुम्हारे लिए सही क्या है
और जानते हुए भी अब तुम्हें
बेबस जीना होगा
अपनी आत्मा को मारना होगा । 
मेरे पास मेरे तर्क थे
कि ये अनजाने में हुआ
एक मौका और...
इतने न सही थोड़े से...
पर उसने कहा
ये सबक है इस जीवन के लिए
ज़रा सी चूक
और सब ऐसे ही ख़त्म हो जाता है
कोई मौका दोबारा नहीं आता है । 
आज तक
मै जी रही
मेरे फलसफों के टूटे टुकड़ों में
अपनी ज़िन्दगी को बिखरते देख रही
रोज़-रोज़ मेरी आत्मा मर रही । 
वो वापस कभी नहीं आया
न दोबारा मिला,
एक चूक मेरी
और... !

- जेन्नी शबनम ( जुलाई 20, 2011)

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