सोमवार, 20 जून 2011

254. मेरे मीत...

मेरे मीत...

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देखती हूँ तुम्हें
चाँद की काया पर,
हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूँ तुम्हें
पाया है तुम्हें
चाँद के सीने पर!

तुम मेरे हो, और मेरे ईश भी,
तुम मेरे हो, और मेरे मीत भी!
तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया,
तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया!

कभी चाँद के दामन से
कुछ रौशनी उधार माँग लाई थी
और उससे तुम्हारी तस्वीर
उकेर दी थी
चाँद पर,
जब जी चाहता है मिलूँ तुमसे
देखती हूँ तुम्हें चाँद की काया पर!


- जेन्नी शबनम (8 फ़रवरी, 2009)
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