Wednesday, February 8, 2012

अब और कितना...

अब और कितना...

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कैलेंडर में हर गुजरे दिन को
लाल स्याही से काट कर
बीतने का निशान लगाती हूँ
साल दर साल अनवरत,
कोई अंतिम दिन नहीं आता
जो मेरे लिए ठहरता हो
न कोई ऐसी तारीख़ आती
जिसके गुजरने का अफ़सोस न हो,
प्रतीक्षा की मियाद
मानो निर्धारित हो
आह्ह्
अब और कितना...
किसी तरह हो
बस अंत हो !

- जेन्नी शबनम (फरवरी 8 , 2012)

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