Tuesday, August 26, 2014

465. जी चाहता है (7 क्षणिकाएँ)

जी चाहता है (7 क्षणिकाएँ)

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1.
जी चाहता है  
तुम्हारे साथ बिताई  
सभी यादों को  
धधकते चूल्हे में झोंक दूँ  
और फिर  
पानी डाल दूँ  
ताकि चिंगारी भी शेष न बचे! 

2.
जी चाहता है  
तुम्हारे साथ बीते  
उम्र के हर वक़्त को  
एक ताबूत में बंद कर  
नदी में बहा आऊँ  
और वापस उस उम्र में लौट जाऊँ  
जहाँ से ज़िन्दगी  
नई राह तलाशती  
सफ़र पर निकलती है! 

3.
जी चाहता है  
तुम्हारे साथ जिए उम्र को  
धकेल कर  
वापस ले जाऊँ  
जब शुरुआत थी  
हमारी ज़िन्दगी की  
और  
तब जो छूटा गया था  
अब पूरा कर लूँ! 

4.
जी चाहता है  
तुम्हारा हाथ पकड़  
धमक जाऊँ  
चित्रगुप्त जी के आॅफिस  
रजिस्टर में से  
हमारे कर्मों का पन्ना फाड़ कर  
उससे पंख बना उड़ जाऊँ  
सभी सीमाओं से दूर!  

5.
जी चाहता है  
टाइम मशीन में बैठ कर  
उम्र के उस वक़्त में चली जाऊँ  
जब कामनाएँ अधूरी रह गई थीं  
सब के सब पूरा कर लूँ  
और कभी न लौटूँ! 

6.
जी चाहता है  
स्वयं के साथ  
सदा के लिए लुप्त हो जाऊँ  
मेरे कहे सारे शब्द  
जो वायुमंडल में विचरते होंगे  
सब के सब विलीन हो जाएँ  
मेरी उपस्थिति के चिह्न  
मिट जाएँ  
न अतीत  
न वर्तमान  
न आधार  
यूँ जैसे  
इस धरा पर  
कभी आई ही न थी! 

7.
जी चाहता है  
पीले पड़ चुके प्रमाण पत्रों और  
पुस्तक पुस्तिकाओं को  
गाढ़े-गाढ़े रंगों में घोलकर  
एक कलाकृति बनाऊँ  
और सामने वाली दीवार में लटका दूँ  
अपने अतीत को  
यूँ ही रोज़ निहारूँ! 

- जेन्नी शबनम (26. 8. 2014)

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Friday, August 15, 2014

464. आज़ादी की बात...

आज़ादी की बात...

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आज़ादी की बाबत पूछते हो 
मानो सीने के ज़ख़्म कुरेदते हो, 
लौ ही नहीं जलती तो 
उजाले की लकीर कहाँ दिखेगी 
अंधेरों की सरपरस्ती में 
दीए की थरथराहट गुम हो जाएगी 
पंछी के पर उगने ही कब दिए 
जो न उगने पर सवाल करते हो, 
तमाम पहर 
तमाम उम्र 
इबादत की  
पर ख़ुदा तो तेरे शहर में नज़रबंद है 
गुहार के लिए देवता कहाँ से लाऊँ, 
बदन के हर हिस्से में 
नंगी तलवारें घुसती हैं 
लहू के कारोबार में 
जिन्दगी मिटती है 
फिर भी आज़ादी के बाबत पूछते हो, 
सदियों से सब सोये हैं 
अपनी-अपनी तकदीर के भरोसे   
जाओ तुम सब सो जाओ 
अपने-अपने महलों में 
कि किसी का मिटना देख न सको
किसी का सिसकना सुन न सको,
हमें तो इंतज़ार है 
जाने कब दबे पाँव 
आ जाए आज़ादी 
और हुंकार के साथ 
छुड़ा दे उस ज़ंजीर से 
जिसने जकड़ रखा है हमारा मन 
और काट डाले उस गुलामी को  
जिससे हमारी साँसें धीरे-धीरे सिमट रही है,  
हर रोज़ एक किरण उगती है मन में 
जो आज़ादी की राह तकती है 
फिर धीरे-धीरे दम तोड़ती है 
पर एक उम्मीद है जो हारती नहीं 
हर रोज़ कहती है -
वह किरण ज़रूर उगेगी 
जो आज़ादी को पकड़ लायेगी    
फिर आज़ादी की बाबत पूछना 
आज़ादी का रंग क्या
और सूरत है क्या
है रोटी और छत की जंग क्या
अस्मत और क़िस्मत की आज़ादी है क्या,
एक दिन सब बतलाऊँगी  
जब ज़रा सी आज़ादी जीऊँगी   
फिर आज़ादी की बात करूँगी !

- जेन्नी शबनम (15 अगस्त 2014)

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