Friday, October 29, 2010

किसी बोल ने चीर तड़पाया...

किसी बोल ने चीर तड़पाया...

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पोर पोर में पीर समाया
किसने है ये तीर चुभाया !

मन का हाल नहीं पूछा और
पूछा किसने धीर चुराया !

गूंगी इच्छा का मोल हीं क्या
गंगा का बस नीर बताया !

नहीं कभी कोई रांझा उसका
फिर भी सबने हीर बुलाया !

न भूली शब्दों की भाषा ''शब''
किसी बोल ने चीर तड़पाया !

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चीर का अर्थ यहाँ - चीरना (दिल चीर देना)
बोल का अर्थ यहाँ - किसी के कहे हुए शब्द
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__ जेन्नी शबनम __ २९. १०. २०१०

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Thursday, October 28, 2010

पहला और आख़िरी वरदान...

पहला और आख़िरी वरदान...

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वो हठी ये क्या कर गया
विष माँगी मैं
वो अमृत चखा गया,
एक बूंद अमृत
हलक में उतार गया,
आह... ये कैसा
ज़ुल्म कर गया !

उस दिन कहा था वो
वक़्त को ललकारा तुमने
मृत्यु माँगी असमय तुमने,
इसलिए है ये शाप -
सदा जीवित तुम रहो अब
अमरता का है वरदान तुमको !

अब तो निर्भय जीवन
अविराम चलायमान जीवन,
जीवित रहना है
जाने कितनी सदी और,
कभी नहीं होगी मृत्यु
कभी नहीं होगी मुक्ति,
तड़प-तड़प कर जीना
शायद तबतक
जबतक नष्ट न हो
समस्त कायनात !

लाख़ करूँ प्रार्थना
नहीं होता कोई तोड़,
चख भी लो जो अमृत
मुमकिन नहीं
होना कभी मृत !

खौफ़ बढ़ता जा रहा
ये मैं क्या कर ली ?
क्या करूँ अब ?
क्यों उसके छल में आ गई ?
क्यों चख लिया अमृत ?
क्यों माँगा था विष ?
क्यों वक़्त से पहले मृत्यु चाही ?
क्यों क्यों क्यों ???

जानती थी कि वो देवदूत है
दे रहा मेरा पहला और
आख़िरी वरदान है,
फिर क्यों अपने लिए
ज़िन्दगी नहीं
मौत माँग ली !

माँगना था तो
प्रेमपूर्ण दुनिया माँगती,
जबतक जियूँ
बेफिक्र जियूँ,
सभी अपनों का प्रेम पाऊँ
कहीं कोई दुखी न हो
सर्वत्र सुख हो
आनंद हो !

चूक मेरी
भूल मेरी,
ज़िन्दगी नहीं मौत की
चाह की,
अब मौत नहीं बस
जीना है,
कोई न होगा मेरा
सब चले जाएँगे,
मैं कभी
शाप मुक्त न हूँगी,
न शाप मुक्त करने वाला
कोई होगा !

- जेन्नी शबनम (28. 10. 2010)

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Wednesday, October 20, 2010

183. देव...

देव...

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देव देव देव...
तुम कहाँ हो?
क्यों चले गए ?
एक क्षण को न ठिठके
तुम्हारे पाँव,
अबोध शिशु पर
क्या ममत्व न उमड़ा,
क्या इतनी भी सुध नहीं
कैसे रहेगी ये अपूर्ण नारी,
कैसे जियेगी
कैसे सहन करेगी संताप
अपनी व्यथा किससे कहेगी,
शिशु जब जागेगा
उसके प्रश्नों का
क्या उत्तर देगी,
वो तो फिर भी बहल जाएगा
अपने निर्जीव खिलौनों में रम जाएगा !

बताओ न देव
क्या कमी थी मुझमें,
किस धर्म का पालन न किया
स्त्री का हर धर्म निभाया
तुम्हारे वंश को भी बढ़ाया,
फिर क्यों देव
यूँ छोड़ गए ?
अपनी व्यथा
अपनी पीड़ा
किससे कहूँ देव?
किससे?
बीती हर रात्रि की याद
क्या नाग-सी न डसेगी,
जब तुम बिन
ये अभागिन तड़पेगी?

जाना था चले जाते
मैं राह नहीं रोकती देव,
बस जगा कर
कह कर जाते,
एक अंतिम आलिंगन
एक अंतिम प्रेम-शब्द,
अंतिम बार तुमको
छू तो लेती,
एक अंतिम बार
अर्धांगनी तुम्हारी
तुमसे लिपट तो लेती,
उन क्षणों के साथ
सम्पूर्ण जीवन
सुख से जी लेती !

आह...
देव...
एक बार बस
कह कर तो देखते
साथ चल देती मैं
छोड़ सब कुछ तुम्हारे संग,
तुम्हारी ही तरह
मैं भी बन जाती एक भिक्षुणी !

ओह देव
अब जो आओगे
मैं तुम्हारी प्रेम-प्रिया नहीं रहूँगी
न तुम आलिंगन  करोगे
मैं अपनी पीड़ा में समाहित
एक अभागिन परित्यक्ता
तुम्हारे चरणों में लोटती
एक असहाय नारी !

संसार केलिए तुम
बन जाओगे महान
लेकिन नहीं समझ पाए
एक स्त्री की वेदना,
चूक गए तुम
पुरुष धर्म से,
सुन रहे हो न
देव देव देव...

__ जेन्नी शबनम __ २०. १०. २०१०

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Friday, October 15, 2010

182. नहीं होता अभिनन्दन.../ nahin hota abhinandan...

नहीं होता अभिनन्दन...

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सहज जीवन
मन का बंधन,
पार होने की चाह
निराशा और क्रंदन,
अनवरत प्रयास
विफलता और रुदन,
असह्य प्रतिफल
नहीं होता अभिनन्दन !

__ जेन्नी शबनम __ १५. १०. २०१०

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nahin hota abhinandan...

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sahaj jivan
mann ka bandhan,
paar hone kee chaah
niraasha aur krandan,
anwarat prayaas
vifalta aur rudan,
asahya pratifal
nahin hota abhinandan.

__ jenny shabnam __ 15. 10. 2010

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Sunday, October 10, 2010

181. जीवन के बाद रूह का सफ़र...

जीवन के बाद रूह का सफ़र...

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इस जीवन के बाद
एक और जीवन की चाह,
रूहानी इश्क का ख्व़ाब
है न अज़ब ये ख़याल !

क्या पता क्या हो
रूह हो या कि
सब समाप्त हो,
कहीं ऐसा न हो
शरीर ख़त्म हो
रूह भी मिट जाए,
या फिर ऐसा हो
शरीर नष्ट हो
रूह रह जाए
महज़ वायु समान,
एहसास तो
मुकम्मल हो
पर रूह
बेअख्तियार हो !

कैसी तड़प होगी
जब सब दिखे
पर हों असमर्थ,
सामने प्रियतम हो
पर हों छूने में विफल,
कितनी छटपटाहट होगी
तड़प बढ़ेगी और
रूह होगी विह्वल !

बारिश हो और भींग न पाएँ
भूख़ हो और खा न पाएँ
इश्क हो और कह न पाएँ
जाने क्या क्या न कर पाएँ !

सशक्त शरीर
पर होते हम असफल,
रूह तो यूँ भी
होती है निर्बल,
जो है अभी हीं
कर लें पूर्ण,
किसी शायद पर
नहीं यकीन सम्पूर्ण !

फिर भी जो न मिल सका
उम्मीद से जीवन लें सजा,
शायद हो इस जन्म के बाद
रूह के सफ़र की नयी शुरुआत !

__ जेन्नी शबनम __ १०. १०. १०

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Friday, October 8, 2010

180. अपने पाँव... / apne paanv...

अपने पाँव...

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क्या बस इतना ही
और सब ख़त्म... !
एक कदम भी नहीं
और सफ़र का अंत... !

उम्मीद नहीं
अब चल पाऊँगी
पहुँच पाऊँगी
दुनिया के उस
अंतिम छोर तक
जिसे निहारती रही
अनवरत वर्षों,
सोचती थी
कभी तो फ़ुर्सत मिलेगी
और जा पहुँचूँगी
अपने पाँव से
वहाँ उस छोर पर
जहाँ सीमा समाप्त होती है
दुनिया की !

अब
नहीं जा सकूँगी कभी
बस निहारती रहूँगी
धुँधली नज़रों से
जहाँ तक भी जाए
निगाह
चाहे समतल ज़मीन हो
या फिर
स्वप्निल आकाश !

कदम तो न बढ़ेंगे
पर नज़र थम-थम कर
साफ़ हो जायेगी,
फिर शायद
निहारूँ
उस जहां को
जहाँ कभी नहीं पहुँच सकूँगी
न चल सकूँगी कभी
अपने पाँव !

- जेन्नी शबनम (8. 10. 2010)

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apne paanv...

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kya bas itna hi
aur sab khatm... !
ek kadam bhi nahin
aur safar ka ant... !

ummid nahin
ab chal paaungi
pahunch paaungi
duniya ke us
antim chhor tak
jise niharati rahi
anavarat varshon,
sochti thee
kabhi to fursat milegi
aur ja pahunchungi
apne paanv se
vahaan us chhor par
jahaan seema samaapt hotee hai
duniya kee !

ab
nahin ja sakungi kabhi
bas nihaarti rahungi
dhundhli nazron se
jahaan tak bhi jaaye
nigaah
chaahe samtal zameen ho
ya phir
svapnil aakaash !

kadam to na badhenge
par nazar tham-tham kar
saaf ho jaayegi,
fir shaayad
nihaarun
us jahaan ko
jahan kabhi nahi pahunch sakungi
na chal sakungi kabhi
apne paanv !

- jenny shabnam (8. 10. 2010)

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Tuesday, October 5, 2010

179. स्याह अँधेरों में न जाना तुम... / syaah andheron mein na jana tum...

स्याह अँधेरों में न जाना तुम...

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वो कहता
जाने क्यों कहता ?
स्याह अँधेरों में
न जाना तुम
उदासी कभी भी
न ओढ़ना तुम
भोर की लालिमा सी
सदा दमकना तुम !

कैसे समझाएँ ?
क्या बतलाएँ ?
उजाले से
दिल कितना घबराता है
चेहरे की चुप्पी में
हर अनकहा दिख जाता है
ख़ुशी ठहरती नहीं
मन तो बहुत चाहता है !

मैंने कोई वादा न किया
उसने कसम क्यों न दिया ?
अब तय किया है
तकदीर के किस्से
उजालों में दफ़न होंगे
दिल में हों अँधेरे मगर
कतार दीयों के सजेंगे
उजाले ही उजाले चहुँ ओर
'शब' के अँधेरे
किसी को न दिखेंगे !

- जेन्नी शबनम (21. 9. 2010)

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syaah andheron mein na jana tum...

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wo kahta
jaane kyon kahta ?
syaah andheron mein
na jana tum
udaasi kabhi bhi
na odhna tum
bhor ki laalima si
sada damakna tum !

kaise samjhaayen ?
kya batlaayen ?
ujaale se
dil kitana ghabraata hai,
chehre ki chuppi mein
har ankaha dikh jata hai,
khushi thaharti nahin
mann to bahut chaahta hai !

maine koi vada na kiya
usne kasam kyon na diya ?
ab taye kiya hai
par takdir ke kisse
ujaalon mein dafan honge
dil mein hon andhere magar
kataar diyon ke sajenge
ujaale hi ujaale chahun ore
'shab' ke andhere
kisi ko na dikhenge !

- jenny shabnam (21. 9. 2010)

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