मंगलवार, 23 जून 2020

675. ईनार

ईनार

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मन के किसी कोने में   
अब भी गूँजती हैं कुछ धुनें   
रस्सी का एक छोर पकड़   
छपाक से कूदती हुई बाल्टी   
ईनार पर लगी हुई चकरी से   
एक सुर में धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती बाल्टी   
टन-टन करती बड़ी बाल्टी छोटी बाल्टी   
लोटा-कटोरा और बाल्टी-बटलोही   
सब करते रहते खूब बतकही   
दाँत माँजना बर्तन माँजना   
कपड़ा फींचना दुख-सुख गुनना   
ननद-भौजाई की हँसी ठिठोली   
सास-पतोह की नोक झोंक   
बाबा-दादी के आते ही   
घूँघट काढ़ करती हड़बड़ी   
चिल्ल-पों करते बच्चों का नहाना   
तुरहा-तुरहिन का आकर साँसे भरना   
प्यासे बटोही की अँजुरी में   
बाल्टी से पानी उड़ेल-उड़ेल पिलाना   
लोटा में पानी भरकर सूरज को अर्घ्य देना   
रोज-रोज वही दृश्य पर ईनार चहकता हर दिन   
भोर से साँझ प्यार लुटाता रुके बिन   
एक सामूहिक सहज जीवन   
समय के साथ बदला मन   
दुख-सुख का साथी ईनार, अब मर गया है   
चापाकल घर-घर आ गया है   
परिवर्तन जीवन का नियम है   
पर कुछ बदलाव टीस दे जाता है   
आज भी ईनार बहुत याद आता है। 

- जेन्नी शबनम (23. 6. 2020) 
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