Sunday, March 27, 2011

ऐ ज़िन्दगी...

ऐ ज़िन्दगी...

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तल्ख़ धूप कितना जलायेगी
अब तो बीत जाये, दिन बुरा,
रहम कर हमपे, ऐ ज़िन्दगी !

बाबस्ता नहीं कोई
दर्द बाँटें, किससे बता,
चुप हो जी ले, ऐ ज़िन्दगी !

दिन के उजाले में स्वप्न पले
ढल गई शाम, अब करें क्या,
किसका रस्ता देखें, ऐ ज़िन्दगी !

वो कहते हैं समंदर में प्यासे रह गए
नदी की तरफ, वो चले ही कब भला,
गिला किससे शिकवा क्यों, ऐ ज़िन्दगी !

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी,
समझें कैसे, उनकी मोहब्बत बता,
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी !

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2011)

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