रविवार, 10 अक्तूबर 2010

181. रूह का सफ़र...

रूह का सफ़र...

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इस जीवन के बाद
एक और जीवन की चाह,
रूहानी इश्क का ख्व़ाब
है न अज़ब यह ख़याल !

क्या पता क्या हो
रूह हो या कि सब समाप्त हो,
कहीं ऐसा न हो
शरीर ख़त्म हो और रूह भी मिट जाए,
या फिर ऐसा हो
शरीर नष्ट हो और रूह रह जाए
महज़ वायु समान,
एहसास तो मुकम्मल हो
पर रूह बेअख्तियार हो !

कैसी तड़प होगी
जब सब दिखे
पर हों असमर्थ,
सामने प्रियतम हो
पर हों छूने में विफल,
कितनी छटपटाहट होगी
तड़प बढ़ेगी और
रूह होगी विह्वल !

बारिश हो और भींग न पाएँ
भूख़ हो और खा न पाएँ
इश्क हो और कह न पाएँ
जाने क्या-क्या न कर पाएँ !

सशक्त शरीर
पर होते हम असफल,
रूह तो यूँ भी होती है निर्बल,
जो है अभी ही कर लें पूर्ण,
किसी शायद पर
नहीं यकीन सम्पूर्ण !

फिर भी जो न मिल सका
उम्मीद से जीवन लें सजा,
शायद हो इस जन्म के बाद
रूह के सफ़र की नयी शुरुआत !

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2010)

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