Friday, May 22, 2009

60. राजनीति...

राजनीति...

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तिश्नगी राजनीति की, बड़ी तिलस्मी होती है
दफ़न मुर्दा जी पड़े (मिले जो कुर्सी), ऐसी ताकत होती है । 
भाड़ में जाए देश सेवा, स्व-सेवा (बस एक धर्म) होती है
भरता रहे भण्डार अपना (विदेश में), ऐसी तिजारत होती है । 

इंसानों की ये चौथी जात (राजनेता), बड़ी रहस्यमयी है
कुरता-पायजामा (धोती), टोपी-अंगरखा, इनकी पहचान होती है । 
इस सफ़ेद पहनावे की चाल, बड़ी ख़तरनाक, रक्तिम-काली है
कीचड़ उछालने और घात पहुँचाने में, इनको महारत हासिल होती है । 

कौमी एकता की, इससे अच्छी मिसाल, दुनिया में नहीं होती
धर्म-जाति का फसाद उखाड़ने में, कमरे के भीतर इनकी साँठ-गाँठ होती है । 
दिख जाए कुर्सी का हसीन चेहरा, दल-बदल के तिकड़म में फिर देर नहीं होती
बेबस जनता फिर भी, संवैधानिक अधिकार (मतदान) के उपयोग के लिए लाचार होती है । 

तिश्नगी राजनीति की, बड़ी तिलस्मी होती है
ईमान बेच कमाए, ऐसी तिजारत होती है । 

- जेन्नी शबनम (मई 22, 2009)

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