Thursday, February 24, 2011

ज़ख़्मी पहर...

ज़ख़्मी पहर...

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वक़्त का
एक ज़ख़्मी पहर
लहू संग
ज़ेहन में समा
जकड़ लिया
मेरी सोच !

कुछ बोलूँ
वो पहर
अपने ज़ख़्म से
रंग देता
मेरे हर्फ़ !

चाहती हूँ,
कभी किसी वक़्त
कह पाऊँ
कुछ रूमानी
कुछ रूहानी-सी
बात !

पर नहीं
अब शायद
कभी नहीं
ज़ख़्मी वक़्त से
मुक्ति नहीं !

नहीं कह पाऊँगी
ऐसे अलफ़ाज़
जो किसी को
बना दे मेरा
और पा सकूँ
कोई सुखद एहसास !

- जेन्नी शबनम (31. 12. 2010)

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