गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

214. ज़ख़्मी पहर...

ज़ख़्मी पहर...

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वक़्त का एक ज़ख़्मी पहर
लहू संग ज़ेहन में समा कर
जकड़ लिया है मेरी सोच !

कुछ बोलूँ
वो पहर अपने ज़ख़्म से
रंग देता है मेरे हर्फ़ !

चाहती हूँ,
कभी किसी वक़्त कह पाऊँ
कुछ रूमानी
कुछ रूहानी-सी बात !

पर नहीं
शायद कभी नहीं
ज़ख़्मी वक़्त से
मुक्ति नहीं !

नहीं कह पाऊँगी
ऐसे अल्फ़ाज़
जो किसी को बना दे मेरा
और पा सकूँ
कोई सुखद एहसास !

- जेन्नी शबनम (31. 12. 2010)

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