शनिवार, 22 जून 2013

410. उठो अभिमन्यु...

उठो अभिमन्यु...

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उचित वेला है 
कितना कुछ जानना-समझना है  
कैसे-कैसे अनुबंध करने हैं
पलटवार की युक्ति सीखनी है 
तुम्हें मिटना नहीं है
उत्तरा अकेली नहीं रहेगी
परीक्षित अनाथ नहीं होगा 
मेरे अभिमन्यु 
उठो जागो  
बिखरती संवेदनाओं को समेटो 
आसमान की तरफ आशा से न देखो 
आँखें मूँद घड़ी भर 
खुद को पहचानो 

क्यों चाहते हो 
सम्पूर्ण ज्ञान गर्भ में पा जाओ
क्या देखा नहीं 
अर्जुन-सुभद्रा के अभिमन्यु का हश्र
छः द्वार तो भेद लिए 
लेकिन अंतिम सातवाँ 
वही मृत्यु का कारण बना 
या फिर सुभद्रा की लापरवाह नींद 

नहीं-नहीं 
मैं कोई ज्ञान नहीं दूँगी
न किसी से सुन कर तुम्हें बताऊँगी
तुम चक्रव्यूह रचना सीखो 
स्वयं ही भेदना और निकलना सीख जाओगे
तुम सब अकेले हो 
बिना आशीष
अपनी-अपनी मांद में असहाय
दूसरों की उपेक्षा और छल से आहत 

जान लो 
इस युग की युद्ध-नीति -
कोई भी युद्ध अब सामने से नहीं 
निहत्थे पर 
पीठ पीछे से वार है
युद्ध के आरम्भ और अंत की कोई घोषणा नहीं
अनेक प्रलोभनों के द्वारा शक्ति हरण  
और फिर शक्तिहीनों पर बल प्रयोग 
उठो जागो 
समय हो चला है
इस युग के अंत का
एक नई क्रान्ति का 

कदम-कदम पर एक चक्रव्यूह है 
और क्षण-क्षण अनवरत युद्ध है 
कहीं कोई कौरवों की सेना नहीं है
सभी थके हारे हुए लोग हैं
दूसरों के लिए चक्रव्यूह रचने में लीन  
छल ही एक मात्र उनकी शक्ति
जाओ अभिमन्यु 
धर्म-युद्ध प्रारम्भ करो 
बिना प्रयास हारना हमारे कुल की रीत नहीं
और पीठ पर वार धर्म-युद्ध नहीं 
अपनी ढ़ाल भी तुम और तलवार भी
तुम्हारे पक्ष में कोई युगपुरुष भी नहीं !

- जेन्नी शबनम (जून 22, 2013)
 (अपने पुत्र अभिज्ञान के जन्म दिन पर)

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शुक्रवार, 14 जून 2013

409. अहिल्या...

अहिल्या...

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छल भी तुम्हारा 
बल भी तुम्हारा
ठगी गई मैं 
अपवित्र हुई मैं 
शाप भी दिया तुमने  
मुक्ति-पथ भी बताया तुमने      
पाषाण बनाया मुझे 
उद्धार का आश्वासन दिया मुझे 
दाँव पर लगी मैं  
इंतज़ार की व्यथा सही मैंने 
प्रयोजन क्या था तुम्हारा ?
मंशा क्या थी तुम्हारी ?
इंसान को पाषाण बनाकर 
पाषाण को इंसान बनाकर 
शक्ति-परीक्षण 
शक्ति-प्रदर्शन 
महानता तुम्हारी
कर्तव्य तुम्हारा 
बने ही रहे महान
कहलाते ही रहे महान 
इन सब के बीच
मेरा अस्तित्व  
मैं कौन?
मैं ही क्यों?
तुम श्रद्धा के पात्र 
तुम भक्ति तुल्य 
और मैं...?

- जेन्नी शबनम (14. 6. 2013)

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शुक्रवार, 7 जून 2013

408. खूँटे से बँधी गाय...

खूँटे से बँधी गाय...

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खूँटे से बँधी गाय 
जुगाली करती-करती 
जाने क्या-क्या सोचती है  
अपनी ताकत 
अपनी क्षमता 
अपनी बेबसी 
और गौ पूजन की परंपरा 
जिसके कारण वह जिंदा है  
या फिर इस कारण भी कि
वैसी ज़रूरतें 
जिन्हें सिर्फ वो ही पूरी कर सकती है  
शायद उसका कोई विकल्प नहीं 
इस लिए जिंदा रखी गई है  
जब चाहा 
दूसरे खूँटे से उसे बाँध दिया गया 
ताकि ज़रूरतें पूरी करे  
कौन जाने 
खुदा की मंशा 
कौन जाने 
तकदीर का लिखा 
उसके गले का पगहा 
उसके हर वक़्त को बाँध देता है 
ताकि वो आज़ाद न रहे कभी 
और उसकी ज़िंदगी 
पल-पल शुक्रगुज़ार हो उनका 
जिन्होंने 
एक खूँटा दिया 
और खूँटा गड़े रहने की जगह 
ताकि 
खूँटे के उस दायरे में 
उसकी ज़िंदगी सुरक्षित रहे  
और वक़्त की इंसाफी  
उसके खूँटे की 
ज़मीन आबाद रहे !

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2013)

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रविवार, 2 जून 2013

407. शगुन...

शगुन...

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हवाएँ
चुप्पी ओढ़ 
हर सुबह 
अंजुरी में अमृत भर 
सूर्य को अर्पित करती है 
पर सूरज है कि
जलने के सिवा 
कोई शगुन नहीं देता...! 

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2013)

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