Thursday, December 19, 2013

430. प्रीत (7 हाइकु)

प्रीत (7 हाइकु)

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1.
प्रीत की डोरी
ख़ुद ही थी जो बाँधी
ख़ुद ही तोड़ी ।

2.
प्रीत रुलाए
मन को भरमाए
पर टूटे न ।

3.
प्रीत की राह
बस काँटे ही काँटे
पर चुभें न ।

4.
प्रीत निराली
सूरज-सी चमके
कभी न ऊबे ।

5.
प्रीत की भाषा,
उसकी परिभाषा
प्रीत ही जाने ।

6.
प्रीत औघड़
जिसपे मंत्र फूँके
वह न बचे ।

7.
प्रीत उपजे
जाने ये कैसी माटी
खाद न पानी ।

- जेन्नी शबनम (8. 12. 2013)

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