Wednesday, August 26, 2009

80. आँखों में इश्क भर क्यों नहीं देते हो

आँखों में इश्क भर क्यों नहीं देते हो

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दावा करते तुम, आँखों को मेरी पढ़ लेते हो
फिर दर्द मेरा तुम, समझ क्यों नहीं लेते हो !

बारहा करते सवाल, मेरी आँखों में नमी क्यों है
माहिर हो, जवाब ख़ुद से पूछ क्यों नहीं लेते हो !

कहते हो कि समंदर-सी, मेरी आँखें गहरी है
लम्हा भर उतर कर, नाप क्यों नहीं लेते हो !

तुम्हारे इश्क की तड़प, मेरी आँखों में बहती है
आकर लबों से अपने, थाम क्यों नहीं लेते हो !

हम रह न सकेंगे तुम बिन, जानते तो हो
फिर आँखों में मेरी, ठहर क्यों नहीं जाते हो !

ज़ाहिर करती मेरी आँखें, तुमसे इश्क है
बड़े बेरहम हो, कुबूल कर क्यों नहीं लेते हो !

मेरे दर्द की तासीर, सिर्फ तुम ही बदल सकते हो
फिर मेरी आँखों में इश्क, भर क्यों नहीं देते हो !

वक़्त का हिसाब न लगाओ, कहते हो सदा
'शब' की आँखों से, कह क्यों नहीं देते हो !

- जेन्नी शबनम (अगस्त 19, 2009)

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