Monday, February 29, 2016

505. मुक्ति का मार्ग (20 हाइकु)

मुक्ति का मार्ग (20 हाइकु)

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1.  
मुक्ति का मार्ग  
जाने कहाँ है गुम  
पसरा तम !  

2.  
कैसी तलाश  
भटके मारा-मारा  
मन-बंजारा !  

3.  
बहुत देखा -  
अपनों का फ़रेब  
मन कसैला !

4.  
मन यूँ थका,  
ज्यों वक्त के सीने पे  
दर्द हो रुका !  

5.  
सफ़र लम्बा  
न साया न सहारा  
जीवन तन्हा !  

6.  
उम्र यूँ बीती,  
जैसे जेठ की धूप  
तन जलाती !

7.  
उम्र यूँ ढली  
पूरब से पश्चिम  
किरणें चलीं !  

8.  
उम्मीदें लौटीं  
चौखट है उदास  
बची न आस !  

9.  
मेरा आकाश
मुझसे बड़ी दूर
है मगरूर।

10.  
चुकता किए  
उधार के सपने  
उऋण हुए !  

11.  
जीवन - भ्रम  
अनवरत क्रम  
न होता पूर्ण !  

12.  
बचा है शेष -  
दर्द का अवशेष,  
यही जीवन !  

13.  
मन की आँखें  
ज़िन्दगी की तासीर  
ये पहचाने !  

14.  
नही ख़बर  
होगी कैसे बसर  
क्रूर ज़िन्दगी !  

15.  
ये कैसा जीना  
ख़ामोश दर्द पीना  
ज़हर जैसा !  

16.  
जीवन - मर्म  
दर्द पी कर जीना  
मानव जन्म !  

17.  
मन - तीरथ  
अकारथ ये पथ  
मगर जाना !  

18.  
ताक पे पड़ी  
चिन्दी-चिन्दी ज़िन्दगी  
दीमक लगी ! 

19.  
स्वाँग रचता  
यह कैसा संसार  
दर्द अपार !  

20.  
मिलता वर  
मुट्ठी में हो अम्बर  
मन की चाह !  

- जेन्नी शबनम (29. 2. 2016)  

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Tuesday, February 16, 2016

504. अर्थहीन नहीं...

अर्थहीन नहीं...  

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जी चाहता है  
सारे उगते सवालों को  
ढ़ेंकी में कूट कर  
सबकी नज़रें बचा कर  
पास के पोखर में फ़ेंक आएँ  
ताकि सवाल पूर्णतः नष्ट हो जाए  
और अपने अर्थहीन होने पर  
अपनी ही मुहर लगा दें  
या फिर हर एक को  
एक-एक गड्ढे में दफ़न कर  
उस पर एक-एक पौधा रोप दें  
जितने पौधे उतने ही सवाल  
और जब मुझे व्यर्थ माना जाए  
तब एक-एक पौधे की गिनती कर बता दें  
कि मेरे ज़ेहन की उर्वरा शक्ति कितनी थी  
मैं अर्थहीन नहीं थी !  

- जेन्नी शबनम (16. 2. 2016)  

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