बुधवार, 6 नवंबर 2019

637. रेगिस्तान

रेगिस्तान 

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आँखें अब रेगिस्तान बन गई हैं 
यहाँ अब न सपने उगते हैं न बारिश होती है 
धूलभरी आँधियाँ चल रही हैं 
रेत पे गढ़े वे सारे हर्फ मिट गए हैं 
जिन्हें सदियों पहले 
किसी ऋषि ने लिख दिया था कि 
कभी कोई दुष्यंत सब विस्मृत कर दे तो 
शंकुतला यहाँ आकर सारा अतीत याद दिलाए 
पर अब कोई स्रोत शेष न रहा 
जो जीवन को वापस बुलाए 
कौन किसे अब क्या याद दिलाए ! 

- जेन्नी शबनम (6. 11. 2019)
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