Monday, May 30, 2011

न मंज़िल न ठिकाना है

न मंज़िल न ठिकाना है

*******

बड़ा अज़ब अफ़साना है, ज़माने से छुपाना है
है बेनाम सा कोई नाता, यूँ ही अनाम निभाना है !

सफ़र है बहुत कठिन, रस्ता भी अनजाना है
चलती रही तन्हा तन्हा, न मंज़िल न ठिकाना है !

धुँधला है अक्स पर, उसे आँखों में बसाना है
जो भी कह दे ये दुनिया, अब नहीं घबराना है !

शमा से लिपटकर अब, बिगड़ा नसीब बनाना है
पलभर जल के शिद्दत से, परवाने सा मर जाना है !

इश्क में गुमनाम होकर, नया इतिहास रचाना है
रोज़ जन्म लेती है 'शब', किस्मत का खेल पुराना है !

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)

_____________________________________________

Friday, May 27, 2011

बच्चे (5 ताँका)

मैंने पहली बार ताँका लिखने का प्रयास किया है, प्रतिक्रिया अपेक्षित है...

बच्चे
(5 ताँका)

*******

1.
नन्ही-सी परी
लिए जादू की छड़ी
बच्चों को दिए
खिलौने और टॉफी
फिर उड़ वो चली !

2.
उनके हाथ
मंझा और पतंग
बच्चे चहके
सब खूब मचले
उड़ी जब पतंग !

3.
उछले कूदे
बड़ा शोर मचाएँ
ये नन्हें बच्चे
राज दुलारे बच्चे
ये प्यारे-प्यारे बच्चे !

4.
दुनिया खिले
आसमान चमके
चाँद-तारों से
घर अँगना सजे
छोटे-छोटे बच्चों से !

5.
प्यारी बिटिया
रुनझुन नाचती
खेल दिखाती
घर-आँगन गूँजे
अम्माँ-बाबा हँसते !

- जेन्नी शबनम (10 . 5 . 2011)

__________________________

Monday, May 23, 2011

चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं...

चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं...

*******

मिलती नहीं मनचाही फ़िज़ा
सभी आशाएं दम तोड़ती हैं
तन्हा तन्हा बहुत हुआ सफ़र
चलो नयी फ़िज़ा हम सजाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

आसान नहीं हर इल्ज़ाम सहना
बेगुनाही जतलाना भी मुमकिन कब होता है
बहुत दूर ठिठका है आसमान
चलो कुछ आसमान अपने लिए तोड़ लाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

बेसबब तो नहीं होता यूँ मूंह मोड़ना
ज़मीन को चाहता है कौन छोड़ना
धुंधली धुंधली नज़र आती है ज़मीन
चलो आसमान पे घर बसाते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

दुनिया के रवाजों से थक गए
हर दौर से हम गुज़र गए
सब कहते दुनिया के काएदे हम नहीं निभाते हैं
चलो एक और गुनाह कर आते हैं
चलो अपना जहाँ अलग हम बसाते हैं!

__ जेन्नी शबनम __ 23. 5. 2011

_________________________________________________

Friday, May 20, 2011

अधरों की बातें...

अधरों की बातें...

*******

तुम्हारे अधरों की बातें
तुम क्या जानो
मेरे अधरों को बहुत भाते हैं,
न समझे तुम मन की बातें
कैसे कहें तुमको
तुम्हें देख हम खिल जाते हैं,
तुम भी देख लो मेरे सनम
प्रीत की रीत
यूँ हीं नहीं निभाते हैं,
शाख पे बैठी कोई चिरैया
गीत प्यार का जब गाती
सुन गीत मधुर
साथी उसके उड़ आते हैं,
ऐसे तुम भी आ जाओ
मेरे अधरों पे गीत रच जाओ
अब तुम बिन हम रह नहीं पाते हैं,
जाने कब आयेंगे वो दिन
जादू सी रातें बीते हुए दिन
वो दिन बड़ा सताते हैं
हर पल तुमको बुलाते हैं
अब हम रह नहीं पाते हैं!

__ जेन्नी शबनम __ 18. 5. 2011

___________________________________________

Monday, May 16, 2011

तीर वापस नहीं होते...

तीर वापस नहीं होते...

*******

जानते हुए कि हर बार और और दूर हो जाती हूँ
तल्ख़ी से कहते हो मुझे कि मैं गुनाहगार हूँ,
मुमकिन है कि मन में न सोचते होओ
महज़ आक्रोश व्यक्त करते होओ,
या फिर मुझे बांधे रखने का ये कोई हथियार हो
या मेरे आत्मबल को तोड़ने की ये तरकीब हो,
लेकिन मेरे मन में ये बात समा जाती है
हर बार ज़िन्दगी चौराहे पर नज़र आती है!
हर बार लगाए गए आरोपों से उलझते हुए
धीरे धीरे तुमसे दूर होते हुए,
मेरी अपनी एक अलग दुनिया
जहां अब तक बहुत कुछ है सबसे छुपा,
वहाँ की वीरानगी में सिमटती जा रही हूँ
खामोशियों से लिपटती जा रही हूँ,
भले तुम न समझ पाओ कि
मैं कितनी अकेली होती जा रही हूँ,
न सिर्फ तुमसे बल्कि
अपनी ज़िन्दगी से भी नाता तोड़ती जा रही हूँ!
तुम्हारी ये कैसी जिद्द है
या कि कोई अहम् है,
क्यों कटघरे में अक्सर खड़ा कर देते हो
जाने किस बात की सज़ा देते हो,
जानते हो न
कमान से निकले तीर वापस नहीं होते,
वैसे हीं
ज़ुबान से किये वार वापस नहीं होते !

__ जेन्नी शबनम __ 11. 5. 2011

_____________________________________________

Wednesday, May 11, 2011

सपने पलने के लिए जीने के लिए नहीं...

सपने पलने के लिए जीने के लिए नहीं...

*******

कामनाओं की एक फेहरिस्त
बना ली हमने
कई छोटी छोटी चाह
पाल ली हमने
छोटे छोटे सपने
एक साथ सजा लिए हमने|
आँखें मूंद बगल की सीट पर बैठी मैं
तेज़ रफ़्तार गाड़ी
जिसे तुम चलाते हुए
मेरे बालों को सहलाते भी रहो और
मेरे लिए कोई गीत गाते भी रहो
बहुत लम्बी दूरी तय करें
बेमकसद
बस एक दूसरे का साथ
और बहुत सारी खुशियाँ,
तुम्हारे हाथों बना कोई
खाना
जिसे कौर कौर मुझे खिलाओ
और फिर साथ बैठ कर
बस मैं और तुम
खेलें कोई खेल,
हाथों में हाथ थामे
कहीं कोई
ऐतिहासिक धरोहर
जिसके कदम कदम पर छोड़ आयें
अपने निशाँ,
कोई एक सम्पूर्ण दिन
जहाँ बातों में
वक़्त में
सिर्फ हम और तुम हों|
तुम्हारी फेहरिस्त में महज़ पांच-छः सपने थे और
मैंने हज़ारों जोड़ रखे थे,
जानते हुए कि एक एक कर सपने टूटेंगे और
ध्वस्त सपनों के मज़ार पर
मैं अकेली बैठी
उन यादों को जीयूँगी,
जो अनायास
बिना सोचे
मिलने पर हमने किये थे,
मसलन
नेहरु प्लेस पर यूँ हीं घूमना
मॉल में पिक्चर देखते हुए कहीं और खोये रहना
हुमायूं का मकबरा जाते जाते
कुतुबमीनार देखने चल देना|
तुमको याद है न
तुम्हारा बनाया आलू का पराठा
जिसका अंतिम निवाला मुझे खिलाया तुमने,
अस्पताल का चिली फ्रेंच फ्राई
जिसे बड़ी चाव से खाया हमने
और उस दिन फिर कहा तुमने
कि चलो वहीं चलते हैं,
हंसकर मैंने कहा था
धत्त...
अस्पताल कोई घुमने की जगह है
या खाने की!
जब भी मिले हम
फेहरिस्त में कुछ नए सपने
और जोड़ लिए,
पुराने सपने वहीं रहे
जो पूरे होने केलिए शायद थे हीं नहीं,
जब भी मिले
पुराने सपने भूल
एक अलग कहानी लिख गए|
अचानक कैसे सब कुछ ख़त्म हो जाता है
क्यों देख लिए जाते ऐसे सपने
जिनमें एक भी पूरे नहीं होने होते,
फेहरिश्त आज भी
मेरे मन पर गुदी हुई है,
जब भी मिलना
चुपचाप पढ़ लेना
कोई इसरार न करना,
फेहरिस्त के सपने, सपने हैं
सिर्फ पलने के लिए, जीने के लिए नहीं!

__ जेन्नी शबनम __ 9. 5. 2011

________________________________________________

Tuesday, May 10, 2011

तन्हा-तन्हा हम रह जाएँगे...

तन्हा-तन्हा हम रह जाएँगे...

*******

सब छोड़ जाएँगे जब हमको
तन्हा-तन्हा हम रह जाएँगे,
किसे बताएँगे ग़म औ खुशियाँ
सदमा कैसे हम सह पाएँगे !

किसकी तकदीर में क्यों हुए वो शामिल
कभी नहीं हम कह पाएँगे,
अपनी हाथ की फिसलती लकीरों में
उनको सँभाल हम कब पाएँगे !

है अज़ब पहेली ज़िन्दगी
उलझन सुलझा कैसे हम पाएँगे,
हर तरफ फैला सन्नाटा
यूँ ही पुकारते हम रह जाएँगे !

हर रोज़ तकरार करते हैं
और कहते कि वो चले जाएँगे,
अपनी शिकायत किससे करें
गैरों से नहीं हम कह पाएँगे !

जाने कैसे कोई रहता तन्हा
मगर नहीं हम रह पाएँगे,
ज़िन्दगी की बाबत बोली 'शब'
तन्हाई नहीं हम सह पाएँगे|

- जेन्नी शबनम (8. 5. 2011)

___________________________________

Sunday, May 8, 2011

माँ (माँ पर 11 हाइकु)

माँ
(माँ पर 11 हाइकु)

*******

1.
तौल सके जो
नहीं कोई तराजू
माँ की ममता !

2.
समझ आई
जब खुद ने पाई
माँ की वेदना !

3.
माँ का दुलार
नहीं है कोई मोल
है अनमोल !

4.
असहाय माँ
कह न पाई व्यथा
कोख़ उजड़ी !

5.
जो लुट गई
लाड़ में मिट गई
वो होती है माँ !

6.
प्यारी बिटिया,
बन गई वो माँ-सी
पी-घर गई !

7.
पराई हुई
घर-आँगन सूना
माँ की बिटिया !

8.
सारा हुनर
माँ से बिटिया पाए
घर बसाए !

9.
माँ का अँचरा
सारे जहाँ का प्यार
घर संसार !

10.
माँ का कहना
कभी नहीं टालना
माँ होती दुआ !

11.
माँ की दुनिया
अँगना में बहार
घर-संसार !

- जेन्नी शबनम (मई 8, 2011)

___________________________

Wednesday, May 4, 2011

हवा खून-खून कहती है...

हवा खून-खून कहती है...

*******

जाने कैसी हवा चल रही है
न ठंडक देती है न साँसें देती है
बदन को छूती है तो जैसे
सीने में बर्छी सी चुभती है । 

हवा अब बदल गई है
यूँ चीखती चिल्लाती है मानो
किसी नवजात शिशु का दम अभी-अभी टूटा हो
किसी नव ब्याहता का सुहाग अभी-अभी उजड़ा हो
भूख़ से कुलबुलाता बच्चा भूख़-भूख़ चिल्लाता हो
बीच चौराहे किसी का अस्तित्व लुट रहा हो और
उसकी गुहार पर अट्टहास गूँजता हो । 

हवा अब बदल गई है
ऐसे वीभत्स दृश्य दिखाती है मानो
विस्फोट की तेज लपटों के साथ बेगुनाह इंसानी चिथड़े जल रहे हों
ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए लोग घर में कैदी हो गए हों
पलायन की विवशता से आहत कोई परिवार अंतिम साँसें ले रहा हो
खेत-खलिहान जंगल-पहाड़ निर्वस्त्र झुलस रहे हों । 

जाने कैसी हवा है
न नाचती है न गीत गाती है
तड़पती, कराहती, खून उगलती है । 

हवा अब बदल गई है
लाल लहू से खेलती है
बिखेरती है इंसानी बदन का लहू गाँव शहर में
और छिड़क देती है मंदिर-मस्ज़िद की दीवारों पर
फिर आयतें और श्लोक सुनती है । 

हवा अब बदल गई है
अब सांय-सांय नहीं कहती
अपनी प्रकृति के विरुद्ध
खून-खून कहती है,
हवा बदल गई है
खून-खून कहती है । 

- जेन्नी शबनम (20. 4. 2011)

____________________________________________

Monday, May 2, 2011

ज़िन्दगी ऐसी ही होती है...

ज़िन्दगी ऐसी ही होती है...

*******

सुनसान राहों से गुजरते हुए
ज़िन्दगी ख़ामोश हो गई है
कविता भी अब मौन हो गई है,
शब्द तो बहुत उपजते हैं
और यूँ ही विलीन हो जाते हैं
बिना कहे शब्द भी खो जाते हैं,
मेरे शब्द चुप हो रहे हैं
और एक चुप्पी मुझमें भी उग रही है
कविता जन्म लेने से पहले मर रही है,
किसे ढूंढ़ कर कहूँ कि साथ चलो
मेरी अनकही सुन लो
न सुनो मेरे लिए कुछ तो कह दो,
सफ़र की वीरानगी जब दिल में उतर जाती है
मानो कि बहुत चले मगर
ज़िन्दगी वहीं ठहरी होती है
अब जाना कि ज़िन्दगी ऐसी ही होती है|

- जेन्नी शबनम (2. 5. 2011)

__________________________________________

Sunday, May 1, 2011

तुम अपना ख़याल रखना...

तुम अपना ख़याल रखना...

*******

उस सफ़र की दास्तान
तुम बता भी न पाओगे
न मैं पूछ सकुंगी
जहाँ चल दिए तुम अकेले अकेले
यूँ मुझे छोड़ कर
जानते हुए कि
तुम्हारे बिना जीना
नहीं आता मुझको
कठिन डगर को पार करने का
सलीका भी नहीं आता मुझको,
तन्हा जीना
न मुझे सिखाया
न सीखा तुमने
और चल दिए
बिना कुछ बताये,
जबकि वादा था तुम्हारा
हमसफ़र रहोगे सदा
अंतिम सफ़र में हाथ थामे
बेख़ौफ़ पार करेंगे रास्ता|

बहुत शिकायत है तुमसे
पर कहूँ भी अब तुमसे कैसे?
जाने तुम मुझे सुन पाते हो कि नहीं?
उस जहां में मैं तुम्हारे साथ हूँ कि नहीं?

सब कहते हैं
तुम अब भी मेरे साथ हो
जानती हूँ ये सच नहीं
तुम महज़ एहसास में हो
यथार्थ में नहीं,
धीरे धीरे मेरे बदन से
तुम्हारी निशानी कम हो रही
अब मेरे जेहन में रहोगे
मगर ज़िन्दगी अधूरी होगी
मेरी यादों में जिओगे
साथ नहीं मगर मेरे साथ साथ रहोगे|

अब चल रही हूँ मैं तन्हा तन्हा
अँधेरी राहों से घबराई हुई
तुम्हें देखने महसूस करने की तड़प
अपने मन में लिए
तुम तक पहुँच पाने केलिए
अपना सफ़र जारी रखते हुए
तुम्हारे सपने पूरे करने के लिए
कठोर चट्टान बन कर
जिसे सिर्फ तुम डिगा सकते हो
नियति नहीं|

मेरा इंतज़ार न करना
तुहारा सपना पूरा कर के हीं
मैं आ सकती हूँ,
छोड़ कर तुम गए
अब तुम भी
मेरे बिना
सीख लेना वहाँ जीना,
थोड़ा वक़्त लगेगा मुझे आने में
तबतक तुम अपना ख़याल रखना|

__ जेन्नी शबनम __ 1. 5. 2011

______________________________________________