Wednesday, February 25, 2009

25. अधूरी कविता...

अधूरी कविता...

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तुम कहते -
सुनाओ कुछ अपनी कविता,
कैसे कहूँ
अब होती नहीं पूरी, मेरी कविता 

अधूरी कविता अब बन गई ज़िन्दगी
जैसे अटक गए हों लफ्ज़, ज़ुबाँ पे,
उलझी-उलझी बातें हैं
कुछ अनकहे अफ़साने हैं
दर्द के गीत और पथरीली राहें हैं 

तुम क्या करोगे सुन मेरी कविता ?
क्या जोड़ोगे कुछ अल्फ़ाज़ नए
ताकि कर सको पूरी, मेरी कविता 

तुम वो दर्द कहाँ ढूँढ़ पाओगे ?
तुम बेइंतेहा प्रेम की प्यास कैसे जगाओगे ?
अपनी आँखों से मेरी दुनिया कैसे देखोगे ?
मेरी ज़िन्दगी का अहसास कहाँ कर पाओगे ?

ज़िद करते हो
तो सुन लो, मेरी आधी कविता 
ज़िद ना करो
पढ़ लो, आधी ही कविता 

गर समझ सको ज़रा भी तुम
मेरी आधी-अधूरी कविता,
वाह-वाही के शब्द
न वारना मुझ पर
ज़ख्मों को मेरे
यूँ न उभारना मुझपर 

पलभर को मेरी रूह में समा
पूर्ण कर दो मेरी कविता 
तुम जानते तो हो
मेरी अधूरी ज़िन्दगी ही है
मेरी अधूरी कविता 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 4, 2008)

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2 comments:

kishor kumar khorendra said...

pal bhr ko meri ruh me sma ,purn kr do meri kvita /tum jante to ho ,meri adhuri jindgi hi hai meri adhuri kvita .......mai yh manta hu ki kvita aur jindgi ek dusre ke pryay hai ..kvita bhi kbhi n smapt hone vali is chetna ke prvah ki trh hi hai ....saral,sundar,smpurnta ki or ingit krti achchhi kvita .jenny..shabnam..ji.!.shubh-kamna

दिवाकर मणि said...

"पलभर को मेरी रूह में समा
पूर्ण कर दो मेरी कविता !
तुम जानते तो हो...
मेरी अधूरी जिंदगी हीं है मेरी अधूरी कविता !"

क्या बात है!! आपकी कविता ने हृदय झंकृत कर दिया. आगे और पढ़ने को मिलता रहेगा..इसी आशा के साथ...