Friday, June 26, 2009

65. सपनों के उपले...

सपनों के उपले...

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अपने सपनों से
कुछ उपले बनाई हूँ,
उपलों को सुलगाकर
जीवन सेंक रही हूँ,
कहीं मेरी ज़िन्दगी
जम न जाए । 

मन को भूख़ जब सताती है
उपलों को दहकाकर
ख़्वाहिशों का खाना पकाती हूँ,
कहीं आत्मा
भूखी मर न जाए । 

अकेलेपन की व्याकुलता
जब तड़पाती है
उपलों को धधकाकर
जीवन का सन्देश तलाशती हूँ,
कहीं ज़िन्दगी
और बोझिल न हो जाए । 

जीवन का अँधियारा
जब डराता है
उपलों को जलाकर
उजाला तलाशती हूँ,
कहीं भटक कर
मंज़िल खो न जाए । 

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 2005)

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