Monday, December 21, 2009

109. क्यों मैं ही थी हारी.../ kyon main hi thee haari...

क्यों मैं ही थी हारी...

*******

सताता है वो पल, जब साँसे महक उठी थी कभी
हौसला तो टूट चूका, जाने अब हो किसकी बारी, 
सिसक-सिसक कर सपने रोते, क्यों देखे थे हमको
क्या कहूँ अब कौन है जीता, क्यों मैं ही थी हारी । 

टुकड़े-टुकड़े लफ्ज़ तुम्हारे, हो गये मन में शाया
करूँ क्या जतन बताओ, जीवन ने बहुत तड़पाया, 
मधुर-मधुर हवाओं ने, जब भी मुझे है सहलाया
तुम्हारी छुवन ने जैसे, हर बार मुझे है भरमाया । 

बवंडर जाने कहाँ से आया, उड़ गए सभी निशान
ख़्वाबों का सफ़र फिसल गया, ज्यों हो मुट्ठी का रेत, 
आओ कि न आओ, ओ मेरे मीत उम्मीद न दो
जीने की शर्त मेरी, तेरी कुछ यादें जो हैं अवशेष । 

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 19, 2009)

___________________________________________

kyon main hi thee haari...

*******

sataata hai wo pal, jab saanse mahak uthi thee kabhi
hausla to toot chuka, jaane ab ho kiski baari.
sisak sisak kar sapne rote, kyon dekhe they humko
kya kahun ab kaun hai jeeta, kyon main hi thee haari.

tukde-tukde lafz tumhare, ho gaye man mein shaayaa
karun kya jatan batao, jiwan ne bahut tadpaya.
madhur-madhur hawaaon ne, jab bhi mujhe hai sahlaaya
tumhaari chhuwan ne jaise, har baar mujhe hai bharmaaya.

bawandar jaane kahan se aaya, ud gaye sabhi nishaan
khwaabon ka safar fisal gaya, jyon ho muthhi ka ret.
aao ki na aao, o mere meet ummid na do
jine ki shart meri, teri kuchh yaadein jo hain awshesh.

- Jenny Shabnam (December 19, 2009)

_____________________________________________________

5 comments:

paraavaani said...

sundar kavita

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया. अच्छी लगी रचना!

jenny shabnam said...

अरविन्द जी,
मेरे ब्लॉग पर आपका सादर अभिनन्दन! आप यहाँ आये और कविता को पसंद किये तहेदिल से आभार!

jenny shabnam said...

समीर जी,
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है! मेरी रचना की सराहना केलिए मन से शुक्रिया!

रश्मि प्रभा... said...

मंत्रमुग्ध कर जाती हैं आपकी रचनाएँ........