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बुधवार, 30 मार्च 2011

226. बुरा न मानो क्रिकेट है

बुरा न मानो क्रिकेट है 

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यहाँ हो रही पूजा, यज्ञ और मान रहे मनौती
कहीं हो रही होगी दुआ, सजदा और माँग रहे मन्नत
अब क्या हो?
खेल नहीं जैसे युद्ध हो
आज तो हो ही जाना चाहिए सार्वजनिक अवकाश
हमारे प्रधानमंत्री को भी चढ़ गया क्रिकेट का बुख़ार
हर छक्का पर बीयर का एक बोतल
हर विकेट पर रम का एक बोतल
ये लगा चौका
अब लगेगा छक्का
जीतना हो गया पक्का

-जेन्नी शबनम (30. 3. 2011)
(हिन्दुस्तान-पाकिस्तान क्रिकेट मैच)
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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

222. आदम और हव्वा

आदम और हव्वा

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क़ुदरत की कारस्तानी है
स्त्री-पुरुष की कहानी है
फल खाकर आदम-हव्वा ने
की ग़ज़ब नादानी है 

चालाकी क़ुदरत की या
आदम-हव्वा की मेहरबानी है
बस गई छोटी-सी दुनिया 
जैसे अन्तरिक्ष में चूहेदानी है 

क़ुदरत ने बसाया यह संसार
जिसमें आदम है, हव्वा है
उन्होंने खाया एक सेब मगर
संतरे-सी छोटी यह दुनिया है 

सोचती हूँ, काश!
एक दो और आदम-हव्वा आए होते
आदम-हव्वा ने दो फल खाए होते
दुनिया बड़ी होती, गहमागहमी और बढ़ जाती

दुनिया दोगुनी, लोग दोगुने होते
हर घर में एक ही जगह पर दो आदमी होते
न कोई अकेला उदास होता
न कोई अनाथ होता
न कहीं तनहाई होती
न कोई तनहा मन रोता

न सुनसान इलाक़ा होता
हर तरफ़ इक रौनक होती
कहीं आदम के ठहाके
कहीं चूड़ियों की खनक होती

हर जगह आदमज़ाद होता
जवानों का मदमस्त जमघट होता
कहीं बच्चों की चहचहाती जमात होती
कहीं बुज़ुर्गों की ख़ुशहाल टोली होती
कहीं श्मशान पर शवों का रंगीन कारवाँ होता
क्या न होता और क्या-क्या होता

सोचो ज़रा ये भी तुम
होता नहीं कोई गुमसुम
मृत्यु पर भी लोग ग़मगीन न होते
गीत मौत का पुरलय होता
जीवन-मृत्यु दोनों का जश्न होता
वहाँ (स्वर्गलोक) के अकेलेपन का भय न होता
कहीं कोई बिनब्याहा बेचारा न होता
कहीं कोई निर्वंश बेसहारा न होता
एक नहीं दो डॉक्टर आते
कोई एक अगर बीमार होता

क्या रंगीन फ़िज़ा होती
क्या हसीन समा होता
हर जगह क़ाफ़िला होता
हर तरफ़ त्योहार होता

सोचती हूँ, काश!
एक और आदम होता
एक और हव्वा होती
उन्होंने एक और फल खाए होते 
दुनिया तरबूज-सी बड़ी होती
सूरज से न डरी होती
तरबूज-सी बड़ी होती

- जेन्नी शबनम (16.3.2011)
(होली के अवसर पर)
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शुक्रवार, 22 मई 2009

60. राजनीति

राजनीति

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तिश्नगी राजनीति की, बड़ी तिलिस्मी होती है
दफ़न मुर्दा जी पड़े (मिले जो कुर्सी), ऐसी ताक़त होती है  
भाड़ में जाए देश सेवा, स्व-सेवा (बस एक धर्म) होती है
भरता रहे भण्डार अपना (विदेश में), ऐसी तिजारत होती है 

इंसानों की ये चौथी जात (राजनेता), बड़ी रहस्यमयी है
कुर्ता-पायजामा (धोती), टोपी-अँगरखा, इनकी पहचान होती है 
इस सफ़ेद पहनावे की चाल, बड़ी ख़तरनाक, रक्तिम-काली है
कीचड़ उछालने और घात पहुँचाने में, इनको महारत हासिल होती है  

क़ौमी एकता की, इससे अच्छी मिसाल, दुनिया में नहीं होती
धर्म-जाति का फ़साद उखाड़ने में, कमरे के भीतर इनकी साँठ-गाँठ होती है  
दिख जाए कुर्सी का हसीन चेहरा, दल-बदल के तिकड़म में फिर देर नहीं होती
बेबस जनता फिर भी, संवैधानिक अधिकार (मतदान) के उपयोग के लिए लाचार होती है 

तिश्नगी राजनीति की, बड़ी तिलिस्मी होती है
ईमान बेच कमाए, ऐसी तिजारत होती है 

- जेन्नी शबनम (मई 22, 2009)
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मंगलवार, 31 मार्च 2009

46. चुनाव! नेता!

चुनाव! नेता!

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राजनीति का दामन थामे, चलते कूटनीति की चाल
बड़ा कठिन है समझना इनको, चलते ऐसी-ऐसी चाल    

पूरे औरत-मर्द और आधे औरत-मर्द से अलग
एक नई बनी आदमी की जात,
हो जिनको दाँव-पेंच में महारत हासिल
ये हैं वो राजनीति के पंडित जात    

सिंहासन के पीछे-पीछे, नेता जी ऐसे भागते बदहवास
जैसे लाल कपड़ों के पीछे, सरपट भागे भड़का साँड़,
मज़हब-मज़हब, देश-देश का खेलते घृणित खेल
जैसे भूखे शेर और मेमनों के बीच होता खूँखार खेल    

हँसुआ से गेहूँ की बाली काटे, एक अकेला बेचारा हाथ
अपने कीचड़ से गँदले होते, सारे कमल एक साथ,
करो सवारी साइकिल पर, या हाथी पर हो सवार
लालटेन युग में आ पहुँचे, अब कैसे कटे सबकी रात   

हर पाँचवें वर्ष का है ये महोत्सव, बोली लगती जनता की
बिल में से निकल-निकल नेता जी, अब हाथ जोड़ते जनता की    
अब चाहे जो झपट ले गद्दी, बचेगी न मुल्क की आन
हर चिह्न आज़मा के हारी, अब तो इससे भली लगती, वही अँग्रेज़ी राज   

- जेन्नी शबनम (2005)
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