Sunday, February 13, 2011

एक स्वप्न की तरह...

एक स्वप्न की तरह...

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बनते बनते जाने कैसे
कई सवाल
बन गई हूँ मैं,
जिनके जवाब
सिर्फ तुम्हारे पास है
पर तुम बताओगे नहीं
ये भी जानती हूँ !
शिकस्त खाना
तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना
मेरी फितरत नहीं,
फिर भी...
जाने क्यों
तुम ख़ामोश होते हो !
शायद ख़ुद को रोके
रखते हो
कहीं मेरी आवारगी
मेरी यायावरी
तुम्हे डगमगा न दे
या फिर तुम्हारी दिशा बदल न दे !
नहीं, मेरे हमदर्द
फ़िक्र न करो
कुछ नहीं बदलेगा
मैं यूँ हीं सवाल बन कर
रह जाऊँगी
जवाब तुमसे पूछूंगी भी नहीं,
ख़ुद में गुम
तुमको यूँ हीं दूर से देखते हुए
एक स्वप्न की तरह...

__ जेन्नी शबनम __ 11. 2. 2011

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10 comments:

रश्मि प्रभा... said...

शिकस्त खाना
तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना
मेरी फितरत नहीं,
फिर भी...bejod

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

रचना में मनोबावों का सुन्दर चित्रण किया है आपने!

अमिताभ मीत said...

Khoob.

Kailash C Sharma said...

शिकस्त खाना
तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना
मेरी फितरत नहीं,

...बहुत खूब ! शब्दों और भावों का बहुत सुन्दर संयोजन..

योगेन्द्र पाल said...

बेहतरीन

mridula pradhan said...

फ़िक्र न करो
कुछ नहीं बदलेगा
मैं यूँ हीं सवाल बन कर
रह जाऊँगी
bahut sunder kavita.

Udan Tashtari said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति!

वन्दना said...

ज़िन्दगी की एक हकीकत ये भी है…………सुन्दर रचना।

Mukesh Kumar Sinha said...

मैं यूँ हीं सवाल बन कर
रह जाऊँगी
जवाब तुमसे पूछूंगी भी नहीं,
ख़ुद में गुम
तुमको यूँ हीं दूर से देखते हुए
एक स्वप्न की तरह...

bahut khub...:)
lekin aisa kyon??:)

***Punam*** said...

mere ehsaas shabd aapke......kuch rachnaaye aisi hi lagti hai.!!!
hamre zehan main dheron sawaal rahte hain par javaab denewala khud bhi ek sawaal ban jaaye to......?????