Thursday, June 21, 2012

353. कासे कहे...

कासे कहे...

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मद्धिम लौ 
जुगनू ज्यों
वही सूरज
वही जीवन
सब रीता
पर बीता !
जीवन यही
रीत  यही
पीर पराई
भान नहीं
सब खोया 
मन रोया !
कठिन घड़ी
कैसे कटी
मन तड़पे  
कासे कहे
नहीं अपना 
सब पराया !
तनिक पूछो
क्यों चाहे
मूक पाखी
कोई साथी
एक बसेरा
कोई सहारा !

- जेन्नी शबनम (जून 21, 2012)

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26 comments:

PRAN SHARMA said...

WAH ! JENNY JI , AAPNE TO GAAGAR MEIN
SAAGAR BHAR DIYAA HAI . CHHOTTE -
CHHOTEE PANKTIYON MEIN AAPNE BADE - BADE BHAV BHARKAR CHAKIT KAR DIYAA
HAI . MUBAARAQ .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

कम शब्दों का प्रयोग करके सारगर्भित रचना प्रस्तुत की है आपने!
सुन्दर प्रस्तुति।
शेअर करने के लिए आभार!

ऋता शेखर मधु said...

लघु पंक्तियाँ...गहन भाव !!

Rakesh Kumar said...

सब खोया मन रोया ! कठिन घड़ी कैसे कटी
मन तड़पे कासे कहे नहीं अपना सब पराया ! तनिक पूछो
क्यों चाहे
मूक पाखी
कोई साथी
एक बसेरा
कोई सहारा !

मन की महिमा अपरम्पार है ,जेन्नी जी.

कहते हैं मन जब स्वयं की आत्मा में ही निमग्न हो जाता है तो उसे सहारा ही नहीं स्थाई बसेरा भी मिल जाता है.पांचो इन्द्रियों की कैद में पड़ा मन तडफता ही रहता है.

कबीर जी इसीलिए कहतें हैं शायद

मन पाँचों के बस परा,मन के बस नहीं पांच
जित देखूँ तित दौ लगी,जित भागूं तित आग

आपकी भावमय प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार जी.

Saras said...

अकेलापन.....क्या चाहे ...एक सहारा ...!!!! सुन्दर जेन्नी जी

रश्मि प्रभा... said...

तनिक पूछो
क्यों चाहे
मूक पाखी
कोई साथी
एक बसेरा
कोई सहारा !.... चाह तो होती ही है न

रविकर फैजाबादी said...

बधाइयाँ बधाइयाँ बधाइयां ।।



दो शब्दों की पंक्तियाँ, ढाती जुल्म अपार ।

पीर पराई कर रही, शब्दों का व्यापार ।

शब्दों का व्यापार, सफ़र लम्हों का चालू ।

सावन मोती प्यार, सीप-मन श्रृद्धा पा लूं ।

पर तडपे मन-व्यग्र, ढूँढ़ता सच्चा हमदम ।

ताप लगे अति तेज, बचा ले बिखरी शबनम ।।

Sonal Rastogi said...

sach kaha :-)

dheerendra said...

मन के भावों की सुंदर अभिव्यक्ति

MY RECENT POST:...काव्यान्जलि ...: यह स्वर्ण पंछी था कभी...

रविकर फैजाबादी said...

प्रस्तुति चर्चा मंच पर, मचा रही हडकम्प ।

मित्र नहीं देरी करो, मार पहुँचिये जम्प ||

--

शुक्रवारीय चर्चा मंच

Maheshwari kaneri said...

सुन्दर भाव ..लाजवाब..जन्नी जी.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 22/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

दो शब्द
गहन भाव
कहीं जुड़ाव
कहीं टकराव
सूखा सावन
यही जीवन
मौन सहें
कासे कहें
सुंदर रचना
सत्य कल्पना ||

Madhuresh said...

रचना जितनी खूबसूरत है उतने ही अच्छे भाव और सन्देश भी..
सादर
मधुरेश

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

अपने ही तरह की... बहुत खुबसूरत... भाव भरी रचना...
सादर बधाई स्वीकारें.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

Rajesh Kumari said...

तनिक पूछो
क्यों चाहे
मूक पाखी
कोई साथी
एक बसेरा
कोई सहारा !
बहुत सुन्दर भाव प्यारी प्रस्तुति

Reena Maurya said...

बहुत ही सुन्दर रचना..
:-)

Dr.Nidhi Tandon said...

सहज,सरल एवं सुन्दर .

amrendra "amar" said...

बहुत ही भावना पूर्ण प्रस्तुति

amrendra "amar" said...

बहुत ही भावना पूर्ण प्रस्तुति

amrendra "amar" said...

बहुत ही भावना पूर्ण प्रस्तुति

mridula pradhan said...

shabdon ka sunder santulan.

सतीश सक्सेना said...

आप प्रभावशाली लिखती हैं ...

विक्रांत बेशर्मा said...

थोड़े शब्दों में यथार्थ का सटीक स्पष्टीकरण ...आभार !!!!!!!!!!!!!!!!!!!

Rakesh Kumar said...

कहाँ हैं जेन्नी जी आजकल.
बहुत दिनों से कोई पोस्ट नही.

मेरा ब्लॉग भी आपके दर्शनों के
लिए इंतजार रत है.