Wednesday, June 6, 2012

349. पंचों का फैसला...

पंचों का फैसला...

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कुछ शब्द उन पंचों के समान
उच्च आसन पर बैठे हैं
जिनके फैसले सदैव निष्पक्ष होने चाहिए
ऐसी मान्यता है, 
सामने 
कुछ अनसुलझे प्रश्न पड़े हैं
विचारार्थ,
वादी प्रतिवादी 
कुछ सबूत 
कुछ गवाह
सैकड़ों की संख्या में 
उद्वेलित भीड़, 
अंततः पंचों का फैसला
निर्विवाद 
निर्विरोध 
उन सबके विरुद्ध 
जिनके पास पैदा करने की शक्ति है
चाहे जिस्म हो या ज़मीन,
फरमान -
बेदखल कर दो 
बाँट दो
काट दो 
लूट लो...!

- जेन्नी शबनम (जून 6, 2012)

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23 comments:

expression said...

जिसकी लाठी उसकी भैंस?????

सशक्त रचना जेन्नी जी.

सस्नेह.

सहज साहित्य said...

्पंच बने ये शब्द रोज़मर्रा ऐसे फ़तवे जारी करतेर हैं , जिनका उद्देश्य सामान्य जन का जीवन मुहाल बना देना है । आपने जो आक्रोश इस कविता में अभिव्यक्त किया है , वह पुर असर है । आपकी अभिव्यक्ति नित्य प्रति और अधिक प्रखर और सशक्त हो रही है । बहुत बधाई !

mridula pradhan said...

prabhwshali......

dheerendra said...

सार्थक सटीक भाव पुर्ण अभिव्यक्ति ,,,,,

MY RESENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: स्वागत गीत,,,,,

Maheshwari kaneri said...

जिनके पास पैदा करने की शक्ति है
चाहे जिस्म हो या ज़मीन,
फरमान -
बेदखल कर दो
बाँट दो
काट दो
लूट लो......आज यही होरहा है...बहुत सार्थक सुन्दर अभिव्यक्ति...

PRAN SHARMA said...

JENNY JI , KHOOBSOORAT KAVITA KE
LIYE AAPKO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.

PRAN SHARMA said...

JENNY JI , KHOOBSOORAT KAVITA KE
LIYE AAPKO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.

Kailash Sharma said...

अंततः पंचों का फैसला
निर्विवाद
निर्विरोध
उन सबके विरुद्ध
जिनके पास पैदा करने की शक्ति है
चाहे जिस्म हो या ज़मीन,

....बहुत मर्मस्पर्शी....लाज़वाब अभिव्यक्ति...

Rakesh Kumar said...

क्या बात है जेन्नी जी.
आपके लम्हों का सफर भी बिलकुल अनूठा है.

दर्शन कौर धनोय said...

पांचो को परमेश्वर मानने वालो की कमी नहीं हैं ....

Anonymous said...

चाहे जिस्म हो या ज़मीन,
फरमान -
बेदखल कर दो
बाँट दो
काट दो
लूट लो......
ye hi to ho raha sabhi jagah .

रश्मि प्रभा... said...

जो जीवित है हर हाल में फैसला उसे ही सुनना होता है !

Suresh kumar said...

चाहे जिस्म हो या ज़मीन,
फरमान -
बेदखल कर दो
बाँट दो
काट दो
लूट लो......
kadvi suchaayi..

Sonal Rastogi said...

इस अंधे राज को हम सभी झेल रहे है
बेदखल कर दो बाँट दो काट दो लूट लो...

DINESH PAREEK said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
आपको हार्दिक शुभकामनायें !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

शब्द पञ्च बने हुए .... बहुत गहन अभिव्यक्ति

सदा said...

गहन भाव लिए ... सशक्‍त अभिव्‍यक्ति ।

Sawai Singh Rajpurohit said...

बहुत सुन्दर रचना शेयर करने के लिये बहुत बहुत आभार,

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

शब्दों को बिम्ब रूप में ले क्या सुन्दर सामयिक रचना रची है आपने....
सादर.

आशा बिष्ट said...

फरमान - बेदखल कर दो बाँट दो काट दो लूट लो... yakinaan..har faisla inhin shbdon ke sath smaapt hota hai ...sundar rachna ma'am....

Rajput said...

चाहे जिस्म हो या ज़मीन,
फरमान -
बेदखल कर दो
बाँट दो....

सार्थक और प्रशंसनीय प्रस्तुति.

Madhuresh said...

हाल ही में खापों के बारे में जानकारी हुई सत्यमेव जयते प्रोग्राम से... जानकार आश्चर्य भी हुआ कि ऐसा भी होता है.. और अभी आपकी कविता पढ़ी.. तो उसी और इंगित करती सी लगी..
अच्छी सार्थक रचना.
सादर

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

great !