गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

483. आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम

आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम 

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इल्म न था इस क़दर टूटेंगे हम   
ये आँखें रोएँगी और हँसेंगे हम !  

सपनों की बातें सारी झूठी-मुठी
लेकिन कच्चे-पक्के सब बोएँगे हम !  

मालूम तो थी तेरी मगरूरियत
पर तुझको चाहा कैसे भूलेंगे हम !  

तेरे लब की हँसी पे हम मिट गए
तुझसे कभी पर कह न पाएँगे हम !  

तुम शेर कहो हम ग़ज़ल कहें
ऐसी हसरत ख़ुद मिटाएँगे हम !  

तू जानता है पर ज़ख़्म भी देता है
तुझसे मिले दर्द से टूट जाएँगे हम !  

किसने कब-कब तोड़ा है 'शब' को
यह कहानी नही सुनाएँगे हम ! 

- जेन्नी शबनम (5. 2. 2015) 

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10 टिप्‍पणियां:

Rajendra kumar ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (06.02.2015) को "चुनावी बिगुल" (चर्चा अंक-1881)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

Unknown ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है !
गोस्वामी तुलसीदास

Kavita Rawat ने कहा…

तुम शेर कहो हम ग़ज़ल कहें
ऐसी हसरत ख़ुद मिटाएँगे हम !
..बहुत सुन्दर ...

ajit nehra ने कहा…

your writing skills and thoughts are heart touching keep it up dear
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Naveen Mani Tripathi ने कहा…

वाह क्या बात है । बहुत खूब ।

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत खूब।

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति :)

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तू जानता है पर ज़ख़्म भी देता है
तुझसे मिले दर्द से टूट जाएँगे हम ...
शायद वो यही चाहता है ... टूट जाएँ बिखर जाएँ हम ... पर प्रेम में बिखरना कहाँ होता है ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

जो लिखा वो बहुत अच्छा है... भाव भी स्पष्ट हो रहे हैं. लेकिन सोच रहा था कि इसे ग़ज़ल कहूँ या न कहूँ, तो देखा कि इसके लेबल में आपने लिखा है तुकबन्दी/ अग़ज़ल... तुकबन्दी तो नहीं कहूँगा मैं, और अगज़ल जैसा कुछ होता नहीं. इसलिये जो भी है प्यारी अभिव्यक्ति है!