Thursday, February 26, 2009

28. शायर...

शायर...

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शायर के अल्फ़ाज़ में
जाने किसकी रूह तड़पती है
हर हर्फ़ में जाने कौन सिसकता है
ख़्वाबों में जाने कौन पनाह लेता है

किसका अफ़साना लिए वो लम्हा-लम्हा जलता है
किसका दर्द वो अपने लफ्ज़ों में पिरोता है
किसका जीवन वो यादों में पल-पल जीता है

शायद ज़ज्बाती है, रूहानी है, वो इंसान है
शायद मासूम है, मायूस है, वो बेमिसाल है
इसीलिए तो गैरों के आँसू अपने शब्दों से पोछता है
और दुनिया का ज़ख्म सहेजकर शायर कहलाता है । 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 5, 2008)

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1 comment:

Keshav Arora said...

bahut achha likha hai ... par sochta hoon ki kya yeh sach hai ki ik insaan doosron pe biti baton ko alfaz sahi mayne mein de paayega?