Sunday, March 8, 2009

34. कुछ पता नहीं...

कुछ पता नहीं...

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बेइंतेहा जीने के जुनून में
ज़िन्दगी कब कहाँ छूट गई
कुछ होश नहीं । 

कारवाँ आता रहा, जाता रहा
कोई अपना, कब बिछुड़ा
कुछ ख़बर नहीं । 

न मेरी ज़िद की बात थी, न तुम्हारी ज़िद की
ज़िन्दगी कब, ज़िल्लत बन गई
कुछ समझ नहीं । 

सागर के दो किनारों की तरह
ज़िन्दगी बँट गई
रोक सकूँ, दम नहीं । 

तूफ़ानों की गर्द
हमारे दिलों में, कब बस गई
हमें एहसास भी नहीं । 

हम भटक गए, कब, क्यों, भटक गए
कोई अंदाजा नहीं
कुछ पता नहीं । 

ज़िन्दगी रूठ गई, बस रूठ गई
दर्द है, शिकवा है, खुद से है
कुछ तुमसे नहीं । 

तुम्हें हो कि न हो, मुझे है
गिला है, शिकायत है,
क्या तुम्हें कुछ नहीं ?

- जेन्नी शबनम (मार्च 7, 2009)

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