रविवार, 22 मार्च 2009

40. बुत और काया...

बुत और काया...

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ख़्यालों के बुत ने
अरमान के होंठों को चूम लिया,
काले लिबास-सी वो रात
तमन्नाओं की रोशनी में नहा गई 

बुत की रूह और काया
पल भर को साथ मिले,
आँखों में शरारत हुई
हाथों से हाथ मिले,
प्रेम की अगन जली
क़यामत-सी बात हुई,
फिर मिलने के वादे हुए
याद रखने के इरादे हुए 

बिछुड़ने का वक़्त जब आया
दोनों के हाथ दुआ को उठे,
चेहरे पे उदासी छाई
आँखों में नमी पिघली,
दर्द मुस्कान बन उभरा
चुप-सी रात ज़रा-सी ठिठकी,
एक दूसरे के सीने में छुप
वे आँसू छुपाए गम भुलाए 

फिर बुत के अरमान
उसकी अपनी रूह
बुत की काया में समा गई,
फिर कभी न मिलने के लिए 

- जेन्नी शबनम (मार्च 21, 2009)

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