Friday, April 17, 2009

54. न तुम भूले, न भूली मैं...

न तुम भूले, न भूली मैं...

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जिन-जिन राहों से होकर, मेरी तक़दीर चली
थक-थक कर तुम्हे ढूँढ़ा, जब जहाँ भी थमी
बार-बार जाने क्यों, मैं हर बार रुकी !

किन-किन बातों का गिला, गई हर बार छली
हार-हार बोझिल मन, मै तो टूट चुकी
डर-डर जाती हूँ क्यों, मैं तो अब हार चुकी !

राहें जुदा-जुदा, डगर तुम बदले, कि भटकी मैं
नसीब है, न मुझे तुमने छला, न मैंने तुम्हें
सच है, न मुझे तुम भूले, न भूली मैं !

अब तो आकर कह जाओ, कैसे तुम तक पहुँचूँ मैं
अब तो मिल जाओ तुम, या कि खो जाऊँ मैं
आख़िरी इल्तिज़ा, बस एक बार तुम्हें देखूँ मैं !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 17, 2009)

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