Tuesday, August 18, 2009

79. हम दुनियादारी निभा रहे

हम दुनियादारी निभा रहे

*******

एक दुनिया, तुम अपनी चला रहे
एक दुनिया, हम अपनी चला रहे !

ख़ुदा तुम सँवारो दुनिया, बहिश्त-सा
महज़ इंसान हम, दुनियादारी निभा रहे !

हवन-कुंड में कर अर्पित, प्रेम-स्वप्न
रिश्तों से, घर हम अपना सजा रहे !

समाज के कायदे से, बगावत ही सही
एक अलग जहां, हम अपना बसा रहे !

अपने कारनामे को देखते, दीवार में टँगे
जाने किस युग से, हम वक़्त बीता रहे !

सरहद की लकीरें बँटी, रूह इंसानी है मगर
तुम सँभलो, पतवार हम अपनी चला रहे !

शब्द ख़ामोश हुए या ख़त्म, कौन समझे
'शब' से दुनिया का, हम फ़ासला बढ़ा रहे !

______________

बहिश्त - स्वर्ग
______________

- जेन्नी शबनम (अगस्त 17, 2009)

______________________________________

1 comment:

शशि "सागर" said...

jenny ji...
din kee shuruaat hee bade hee khoobsurat ghazal se hui...
bahut-bahut shukriya aapka.