Wednesday, November 11, 2009

96. नाम तुम्हारा कभी लिया नहीं / naam tumhara kabhi liya nahin

नाम तुम्हारा कभी लिया नहीं

*******

ऊँगली के पोरों से मन में, नाम कभी लिखा नहीं
शून्य में ठहर न जाए, नाम तुम्हारा कभी लिया नहीं 

आस्था का दीप न जलता, न मन कोई राग बुनता
मन की पीर प्रतिमा क्या जाने, उसने कभी जिया नहीं 

कविताओं के छंद में, क्षण-क्षण प्रतीक्षित मन में
भ्रम देता स्वप्न सदा, पर जाने क्यों कभी टिका नहीं 

व्यथा की घोर घटा, उस पर कर्त्तव्य का ऋण बड़ा
विह्वल मन को ठौर तनिक, तुमने भी कभी दिया नहीं 

बूँद-बूँद स्वयं को पीकर, 'शब' की होती रात नम
राह निहारती नमी पी ले, ऐसा कोई कभी मिला नहीं 

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 9, 2009)

________________________________________________

naam tumhara kabhi liya nahin

*******

oongli ke poron se, man mein naam kabhi likha nahin
shoonya mein thahar na jaaye, naam tumhara kabhi liya nahin.

aastha kaa deep na jalta, na man koi raag bunta
man kee peer pratima kya jaane, usne kabhi jiya nahin.

kavitaaon ke chhand mein, kshan-kshan prateekshit man mein
bhram deta swapn sada, par jaane kyun kabhi tika nahin.

vyatha kee ghor ghata, us par kartavya ka rin bada
vihwal man ko thaur tanik, tumne bhi kabhi diya nahin.

boond boond swayam ko pikar, 'shab' kee hoti raat nam
raah nihaarti namee pee le, aisa koi kabhi mila nahin.

- Jenny Shabnam (November 9, 2009)

___________________________________________________

2 comments:

MANOJ KUMAR said...

बूंद बूंद स्वयं को पीकर, ''शब'' की होती रात नम
राह निहारती नमी पी ले, ऐसा कोई कभी मिला नहीं !
भाषा की सर्जनात्मकता के साथ अनुभूति को उजागर करती आत्माभिव्यक्ति, बधाई।

रश्मि प्रभा... said...

नाम लिया नहीं,पर शब्द-शब्द जीती रही..........
इसी को प्यार कहते हैं