Wednesday, December 16, 2009

107. क्यों दिख रही ज़िन्दगी.../ kyon dikh rahi zindagi...

क्यों दिख रही ज़िन्दगी...

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मेरे सफ़र की दास्तान न पूछ, ऐ हमदर्द
कम्बख्त ! हर बार ज़िन्दगी छूट जाती है,
पुरज़ोर जब भी पकड़ती हूँ, पाँव ज़मीन के
उफ्फ़ ! किस अदा से किनारा कर जाती है । 

शफ़क के उस पार, दिख रही कुछ रौशनी
एक दीये की लौ है, क्यों दिख रही ज़िन्दगी ?
कौन जला रहा, यूँ अपने दिल को शबोरोज़
मुझे पुकारा नहीं, क्यों बढ़ी जा रही ज़िन्दगी ? 

बस एक बार पलट कर आ भी जा, ऐ वक़्त
मुमकिन है कि मेरी आरज़ू, किसी को नहीं,
शायद हो कोई गुंजाइश, इन अँधेरों में 'शब'
कुछ चिरागों की ख्वाहिशें, बुझी भी तो नहीं । 

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शबोरोज़ - रात-दिन/ लगातार
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- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 14, 2009)

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kyon dikh rahi zindagi...

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mere safar ki daastaan na puchh, ae humdard
kambakht! har baar zindagi chhoot jaati hai,
purzor jab bhi pakadti hun, paanw zameen ke
uff! kis adaa se kinaara kar jaati hai.

shafaq ke us paar, dikh rahi kuchh raushani
ek diye kee lau hai, kyon dikh rahi zindagi ?
kaun jalaa rahaa, yun apne dil ko shaboroz
mujhe pukaara nahin, kyon badhi jaa rahi zindagi ?

bas ek baar palat kar aa bhi jaa, ae waqt
mumkin hai ki meri aarzoo, kisi ko nahin.
shaayad ho koi gunjaaish, in andheron mein 'shab'
kuchh chiraagon kee khwaahishein, bujhi bhi to nahin.

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shaboroz - raat-din/ lagaataar
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- Jenny Shabnam (December 14, 2009)

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6 comments:

मनोज कुमार said...

दिलचस्प, अनुभवों की सांद्रता।

अजय कुमार झा said...

वाह वाह सुभान अल्लाह क्या बात है जेनी जी ,
सभी सुंदर अति सुंदर ....

रश्मि प्रभा... said...

मेरे सफ़र की दास्तान न पूछ, ऐ हमदर्द
कम्बख्त...हर बार ज़िन्दगी छूट जाती है !
पुरज़ोर जब भी पकड़ती हूँ, पाँव ज़मीन के
उफ्फ़...किस अदा से किनारा कर जाती है !
........
बहुत ही बढ़िया

Rajey Sha said...

बहुत ही प्‍यारा लि‍खा है।

GAUTAM SACHDEV said...

मेरे सफ़र की दास्तान न पूछ, ऐ हमदर्द
कम्बख्त...हर बार ज़िन्दगी छूट जाती है !
पुरज़ोर जब भी पकड़ती हूँ, पाँव ज़मीन के
उफ्फ़...किस अदा से किनारा कर जाती है !
“ जब कोई मस्तानी सी कलम दुख्ती सी कसकों और दिखती सी आपदाओं के बीच
अपने जीवन के अनन्त बैभव को अनोखे अन्होनेपन कि भाशा देता है तो अभिव्यक्ति स्वयं प्रस्फ़ुटित हो जाती है ।
मै इससे अधिक शायद कुछ कहने कि स्थिति में नही हूं।

'अदा' said...

मेरे सफ़र की दास्तान न पूछ, ऐ हमदर्द
कम्बख्त...हर बार ज़िन्दगी छूट जाती है !
पुरज़ोर जब भी पकड़ती हूँ, पाँव ज़मीन के
उफ्फ़...किस अदा से किनारा कर जाती है !

बहुत ही खूबसूरती से आपने शब्दों को पिरोये हैं अपने अहसास के धागे में...
दिल में कहीं ये सबकुछ बैठता सा लगा है...
धन्यवाद...