Thursday, November 4, 2010

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है...

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है...

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रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है
क़यामत से कब हो सामना, सोच में वो क़हर ज़ारी है !

मुख़ातिब होते रहे हर रोज़ फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है !

शिकायत की उम्र बीती, अब सुनाने से क्या फायदा
जल जल कर दहकता है मन, ताव की लहर ज़ारी है !

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर ज़ारी है !

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे ''शब''
शेष नहीं फिर भी, जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है !

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दहर - ज़िन्दगी/ संसार
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__ जेन्नी शबनम __ ४. ११. २०१०

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12 comments:

Pankaj Trivedi said...

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर ज़ारी है !

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे ''शब''
शेष नहीं फिर भी, जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है !

क्या नजाकत से गहरी तक ले जाती हो.... बहुत बहुत बधाई |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मुख़ातिब होते रहे हर रोज़ फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है

बहुत मर्मस्पर्शी ...

दीपावली की शुभकामनाएं

DIMPLE SHARMA said...

बहुत अच्छा पोस्ट , दीपावली की शुभकामनाये
sparkindians.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन गज़ल!


सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

-समीर लाल 'समीर'

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना है!
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प्रेम से करना "गजानन-लक्ष्मी" आराधना।
आज होनी चाहिए "माँ शारदे" की साधना।।

अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।

आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

रश्मि प्रभा... said...

मुख़ातिब होते रहे हर रोज़ फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है !
nihshabd ek ghulte zahar ke saath hun ...

मनोज कुमार said...

उम्दा ग़ज़ल।

चिरागों से चिरागों में रोशनी भर दो,
हरेक के जीवन में हंसी-ख़ुशी भर दो।
अबके दीवाली पर हो रौशन जहां सारा
प्रेम-सद्भाव से सबकी ज़िन्दगी भर दो॥
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
सादर,
मनोज कुमार

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बेहतरीन गज़ल....दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें...

वन्दना said...

दिल को छू जाने वाली रचना।

अनुपमा पाठक said...

gahan chintan ka parinaam hai yah sundar rachna!!!
marmsparshi!
regards,

Dorothy said...

अपने परिवेश में मौजूद अंतर्विरोधों के झंझावातों से जूझते संवेदनशील मन की एक बेहद संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

सहज साहित्य said...

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे ''शब''
-जो खामोशी की ज़ुबाँ समझ सकता है , वही किसी इंसान की गहन अनुभूति को समझ सकता है । शबनम जी का यह कथन सोलहों आने सच है । कविता में भी ऐसा ही कुछ अनकहा होता है , जो उसका प्राण होता है , सौन्दर्य होता है । शबनम जी की रचनाएँ जीवन की तपिश की रचनाएँ हैं । ख़ुदा आपकी लेखनी का परचम और ऊँचा फहराता रहे!
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु।