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मंगलवार, 14 नवंबर 2017

562. फ़्लाइओवर

फ़्लाइओवर 

***  

एक उम्र नहीं, एक रिश्ता नहीं  
कई किस्तों में, कई हिस्सों में  
बीत जाता है जीवन  
किसी फ़्लाइओवर के नीचे  
प्लास्टिक के कनात के अन्दर  
एक सम्पूर्ण एहसास के साथ। 

गुलाब का गुच्छा, सस्ती किताब, सस्ते खिलौने  
जिन पर उनका हक़ होना था  
बेच रहे पेट की ख़ातिर
काग़ज़ और कपड़े के तिरंगे झण्डे   
आज बेचते, कल कूड़े से उठाते  
मस्तमौला, तरह-तरह के करतब दिखाते  
और भी जाने क्या-क्या है  
जीवन गुज़ारने का उनका ज़रीया। 
 
आज यहाँ, कल वहाँ  
पूरी गृहस्थी चलती है  
इस यायावरी में फूल भी खिलते  
वृक्ष वृद्ध भी होते हैं  
जाने कैसे प्रेम पनपते हैं। 
 
वहीं खाना, वहीं थूकना  
बदबू से मतली नहीं  
ग़ज़ब के जीवट, गज़ब का ठहराव  
जो है, उतने में ख़ुश  
कोई सोग नहीं, कोई बैर नहीं  
जो जीवन उससे संतुष्ट  
और ज़्यादा की चाह नहीं 
आखिर क्यों?  
न अधिकार चाहिए, न सुधार चाहिए। 
  
बस यों ही  
पुश्त-दर-पुश्त  
खम्भे की ओट में  
कूड़े के ढेर के पास  
फ़्लाइओवर के नीचे  
देश का भविष्य तय करता है  
जीवन का सफ़र।  

-जेन्नी शबनम (14.11.2017)  
(बाल दिवस)
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सोमवार, 14 नवंबर 2016

531. बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज

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बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,  
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

देस परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

जाने कितने ख़्वाब सँजोता    
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से ख़ुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है   

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2016) 
(बाल दिवस)  
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रविवार, 14 नवंबर 2010

189. कैसा लगता होगा

कैसा लगता होगा

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कैसा लगता होगा
जब किसी घर में
अम्मा-बाबा संग 
बिटिया रहती है
कैसा लगता होगा
जब अम्मा कौर-कौर 
बिटिया को खिलाती है
कैसा लगता होगा
जब बाबा की गोद में 
बिटिया इतराती है

क्या जानूँ वो एहसास
जाने कैसा लगता होगा
पर सोचती हूँ हमेशा
बड़ा प्यारा लगता होगा
अम्मा-बाबा की बिटिया का
सब कुछ वहाँ कितना
अपना-अपना-सा होता होगा

बहुत मन करता है
एक छोटी बच्ची बन जाऊँ
ख़ूब दौडूँ-उछलूँ-नाचूँ   
बेफ़िक्र हो शरारत करूँ
ज़रा-सी चोट पर
अम्मा-बाबा की गोद में
जा चिपक उनको चिढ़ाऊँ

सोचती हूँ
अगर ये चमत्कार हुआ तो
बन भी जाऊँ बच्ची तो
अम्मा-बाबा कहाँ से लाऊँ?
जाने कैसे थे, कहाँ गए वो?
कोई नहीं बताता, क्यों छोड़ गए वो?

यहाँ सब यतीम
कौन किसको समझाए
आज तो बहुत मिला प्यार सबका
रोज़-रोज़ कौन जतलाए
यही है जीवन 
समझ में अब आ ही जाए

न मैं बच्ची बनी
न बनूँगी किसी की अपनी
हर शब यूँ ही तन्हा
इसी दर पर गुज़र जाएगी
रहम से देखती आँखें सबकी
मेरी ख़ाली हथेली की दुआ ले जाएगी

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2010)
(बाल दिवस पर एक यतीम बालिका की मनोदशा)
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