Thursday, January 20, 2011

तुम्हारा कंधा...

तुम्हारा कंधा...

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अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना मुझे
उस दिन अपना वक़्त
जैसे दिया था तुमने,
तमाम सपनों की टूटन का दर्द
जो पिघलता है मुझमें
और मेरी हँसी बन
बिखरता है फ़िज़ाओं में,
बह जाने देना
शायद
इसके बाद
खो दूँ तुम्हें !

उस वक़्त का वास्ता
जब आँखों से
ज़िन्दगी जी रही थी मैं
और तुम अपनी आँखों से
ज़िन्दगी दिखा रहे थे मुझे,
नहीं रुकना तुम
चले जाना
बिना सच कहे मुझसे,
कुछ भी
अपने लिए
नहीं मांगूंगी मैं
वादा है तुमसे !

यक़ीनन झूठ को ज़मीन नहीं मिलती
पर एक पाप तुम्हारा
मेरे हर जन्म पर एहसान होगा,
और मुमकिन है
वो एक क़र्ज़
अगले जन्म में
मिलने की वज़ह बने !

तुम्हारी आँखों से नहीं
अपनी आँखों से
ज़िन्दगी देखने का मन है,
भ्रम में जीने देना
मुझे बह जाने देना,
अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना !

__ जेन्नी शबनम __ ११. १. २०११

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11 comments:

Neelam said...

उस वक़्त का वास्ता
जब आँखों से
ज़िन्दगी जी रही थी मैं
और तुम अपनी आँखों से
ज़िन्दगी दिखा रहे थे मुझे,
नहीं रुकना तुम
चले जाना
बिना सच कहे मुझसे,
कुछ भी
अपने लिए
नहीं मांगूंगी मैं
वादा है तुमसे !

तुम्हारी आँखों से नहीं
अपनी आँखों से
ज़िन्दगी देखने का मन है,
भ्रम में जीने देना
मुझे बह जाने देना,
अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना !
Jenny ji pehle bhi aapko maine padha hai..sach aap behadd umda likhti hain.

रश्मि प्रभा... said...

तुम्हारी आँखों से नहीं
अपनी आँखों से
ज़िन्दगी देखने का मन है,
भ्रम में जीने देना
मुझे बह जाने देना,
अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना !
udhaar ka kandha ... kitni vivashta hai isme , bhram se baahar nikalna kitna mushkil , use banaye rakhne ki khatir ... tumhara kandha

वन्दना said...

ओह! चाहत को पंख दे रही हैं…………बेहद उम्दा प्रस्तुति………पसन्द आई।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

तुम्हारी आँखों से नहीं
अपनी आँखों से
ज़िन्दगी देखने का मन है,
भ्रम में जीने देना
मुझे बह जाने देना,
अपना कंधा
एक दिन उधार दे देना

बहुत भावपूर्ण रचना ....रोने के लिए भी किसी का कंधा चाहिए ..

nilesh mathur said...

दिल की गहराइयों से निकली बेहतरीन अभिव्यक्ति!

***Punam*** said...

"यक़ीनन झूठ को ज़मीन नहीं मिलती
पर एक पाप तुम्हारा
मेरे हर जन्म पर एहसान होगा,
और मुमकिन है
वो एक क़र्ज़
अगले जन्म में
मिलने की वज़ह बने !"



बहुत खूब !

अगले जन्म में मिलने का

इससे अच्छा तरीका शायद ही कोई होगा...!!

वो"पाप"मैं भी करना चाहूंगी...

जो अगले जन्म में हमें मिला दे...!!!

बेहतरीन...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

आशा और सहयोग से लबरेज उत्तम रचना!

सहज साहित्य said...

यक़ीनन झूठ को ज़मीन नहीं मिलती
पर एक पाप तुम्हारा
मेरे हर जन्म पर एहसान होगा,
और मुमकिन है
वो एक क़र्ज़
अगले जन्म में
मिलने की वज़ह बने !
सचमुच जो तथाकथित पाप माना जाता है , आत्मा की वही व्याकुलता शायद अगले जन्म का कारण बनती हो । आप तो दर्शन की गहन बात को भी चुटकियों में प्रस्तुत करने की क्षमता रखती हैं ।

मनोज कुमार said...

इस रचना ने दिल को छुआ!

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi.

Madhu Rani said...

जितनी भी तारीफ करूं कम है, जेन्नी।