Sunday, March 6, 2011

क्यों होती है आहत...

क्यों होती है आहत...

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लपलपाती जुबां ने
जाने क्या कहा
थर्रा उठी वो बीच सड़क,
गुज़र गए कई लोग
बगल से
मुस्कुराकर,
यूँ जैसे देख लिया हो
किसी नव यौवना का नंगा बदन
और फुरफुरी सी
दौड़ गई हो बदन में !

झुक गए सिर
ख़ामोशी से उसके,
फिर आसमान में
ताका उसने,
सुना है कि वो आसमान में रहता है
क्यों नहीं दीखता उसे?
ऐसी रोज़ की शर्मिंदगी से
क्यों नहीं बचाता उसे?
करती तो है रोज़ सज़दा
क्यों नहीं सुनता उसे?

आँखों में पाशविकता
जुबां में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी,
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं !

__ जेन्नी शबनम __ 8 मार्च 2010 (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)

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12 comments:

रश्मि प्रभा... said...

achhi rachna ...

आशा ढौंडियाल said...

sach me di, murde hi hote hain aise behaya log...

kitani saraltaey se aapne ek stree ki peeda ko shabd diye hain..har stree ko aisi sharmindagi se do chaar hona padta hai...

aapki saksham lekhni ko salam di..

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (7-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

vijaymaudgill said...

सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं !

aapne rachna ko bahut acche dhang se sameta hai.

bahut khoob

shukriya

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आँखों में पाशविकता
जुबां में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी,
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं !
--
सुन्दर भावभरी रचना!

anupama's sukrity ! said...

सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं !

सशक्त तीखी आलोचना -
पढ़कर सोचने पर मजबूर हो गया मन -
महिला दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं .

कुश्वंश said...

आँखों में पाशविकता
जुबां में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी

खूबसूरत और भावमयी रचना

Kailash C Sharma said...

सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं !

बहुत सुन्दर और सशक्त प्रस्तुति..

सहज साहित्य said...

आँखों में पाशविकता
जुबां में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी,
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं !
-शबनम जी आज चाहे मीडिया हो , चाहे राजनी ति और चाहे सीरियल नारी को नितान्त आपतिजनक स्थिति में वे लोग प्रस्तुत कर रहे हैं, जो नारी-सम्मान की ऊँची-ऊँची बाते हाँकते हैं। अगर हम विश्व के तनाशाहों को ( यहाँ तक की किसी हद तक सर्वहारा समाज के रक्षक तक भी) अपनी काली करतूतों और नारी-शोषण से बाज नहीं आए । आज तो सभ्य कहालाने वाले राष्ट्रों की बड़ी हस्तियाँ ऐसे कामो को अपनी मर्दानगी की पहचान समझते हैं । देवदासियों और चेलियों के नाम पर आज भी कुछ धर्माधिकारी जनता को बेवकूफ़ बना रहे हैं । कोई कम नहीं , बस रंगरूप बदल गया ।आप तो जिस भी समस्या पर लिखे, वह मर्मस्पर्शी ही नहीं आँखें खोलनेवाला होता है ।

धीरेन्द्र सिंह said...

एक सामयिक रचना, मन को उद्वेलित कर देती है.

अनामिका की सदायें ...... said...

प्रभाव्शालि रचना.

***Punam*** said...

जीवन में इस तरह की घटनाएं रोज़ ही होती रहती हैं आँखों के सामने और बगल से लोग मुस्कुरा के निकल जाते है...!!
जिस पर यह बीतती है उसका अंदाज़ शायद ही कोई
लगा पाए.....
लेकिन जो लोग इस तरह की घटना को सामने घटते देखते हैं..या इसमें भागिदार होते हैं
प्रश्नचिन्ह उन पर भी लगता है कि वो आखिर हैं क्या ???