शनिवार, 30 अप्रैल 2011

237. आग सुलग रही है...

आग सुलग रही है...

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एक आग सुलग रही है
सदियों से,
मन पर बोझ है
कसक उठती है सीने में,
सिसक-सिसक कर है जीती
पर ख़त्म नहीं होती ज़िन्दगी । 
अब तो आग को हवा मिल रही है
सब भस्म कर देने का मन है,
पर ऐसी चाह तो न थी
जो अब दिख रही,
जीतने का मन था
किसी की हार कब चाही थी ?
सीने की जलन का क्या करूँ ?
क्या इनके साथ हो कर
शांत कर लूँ ख़ुद को ?
सब तरफ आग-आग
सब तरफ हिंसा-हिंसा
कैसे हो जाऊँ इनके साथ ?
वो सभी खड़े हैं साथ देने के लिए
मेरे ज़ख़्म को हवा देने के लिए
अपने लिए दूसरों का हक
छीन लेने के लिए,
नहीं ख़त्म होनी है अब
सदियों की पीड़ा,
नहीं चल सकती मैं
इनके साथ । 
बात तो फिर वही रह गई
अब कोई और शोषित है
पहले कोई और था,
एक आग
अब उधर भी सुलग रही,
जाने अब क्या होगा ?

- जेन्नी शबनम (19. 4. 2011)

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6 टिप्‍पणियां:

सहज साहित्य ने कहा…

'आग सुलग रही' कविता में सदियों से झुलसाती आग के विभिन्न आयाम चित्रित किए गए हैं । सब तरफ आग आग
सब तरफ हिंसा हिंसा
कैसे हो जाऊँ इनके साथ?सही कहा आपने , जागरूक व्यक्ति कभी भीड़तन्त्र की सोच के अनुसार नहीं चल सकता ।
"वो सभी खड़े हैं साथ देने केलिए
मेरे ज़ख़्म को हवा देने केलिए
अपने लिए दूसरों का हक
छीन लेने केलिए,
नहीं ख़त्म होनी है अब
सदियों की पीड़ा,
नहीं चल सकती मैं
इनके साथ । ।
बात तो फिर वही रह गई
अब कोई और शोषित है
पहले कोई और था,
एक आग
अब उधर भी सुलग रही,
जाने अब क्या होगा? -यही प्रतिरोध का निश्चय उस जागरण की तरफ़ बढ़ते कदम है, जो अन्याय और शोषण का मुकाबला करन चाहता है ।सारी विषम परिस्थितियों का अन्त यही होता है कि शोषण की केवल दिशा बदल जाती है और वह फिर ज़िन्दा बना रहता है । जेन्नी शबनम जी ने इस तथ्य की गहन पड़ताल की है ।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहन अभिव्यक्ति!!!

SAJAN.AAWARA ने कहा…

KISI KI HAAR KAB CHAHI THI. . .
. , . . . . . . . . . . .BHAVPURN RACHNA. MAM AAP BHI HMARE BLOG PAR AAYEN OR MUJHKO DISHANIRDES DE. AABHARI . . . . JAI BHARAT

OM KASHYAP ने कहा…

sunnder rachna man ki pida ko sabdo mein sunder roop diya aapne

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बात तो फिर वही रह गई
अब कोई और शोषित है
पहले कोई और था,
एक आग
अब उधर भी सुलग रही,
जाने अब क्या होगा?
wahi , jo hota aaya hai

***Punam*** ने कहा…

वो सभी खड़े हैं साथ देने केलिए
मेरे ज़ख़्म को हवा देने केलिए
अपने लिए दूसरों का हक
छीन लेने केलिए

अब कोई और शोषित है
पहले कोई और था,
एक आग
अब उधर भी सुलग रही,
जाने अब क्या होगा?


कभी कभी कुछ न्याय ईश्वर के लिए छोड़ देने चाहिए..