Saturday, June 11, 2011

हो ही नहीं...

हो ही नहीं...

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कौन जाने सफ़र कब शुरू हो
या कि हो ही नहीं,
रास्ते तो कहीं जाते नहीं
चलना मेरे नसीब में हो ही नहीं !

- जेन्नी शबनम (1. 2. 2011)

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9 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

अच्छा शेर है जी!

रश्मि प्रभा... said...

kuch shabd , gahre bhaw

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

bahut chhoti se kintu bahut gambheer rachna ... umda..

मनोज कुमार said...

लाजवाब।

Jyoti Mishra said...

waah waah !!
Rally beautiful.... this shows the uncertainties in life.

सहज साहित्य said...

कौन जाने सफ़र कब शुरू हो
या कि हो हीं नहीं,
रास्ते तो कहीं जाते नहीं
चलना मेरे नसीब में हो हीं नहीं ! जेन्नी जी आपकी इस कविता को पढ़कर मैं इतना ही कह सकता हूँ - तलाशेगी सफ़र में किसी दिन मंजिल तुमको हर पड़ाव इन कदमों के बहुत करीब होगा । तुम बहते हुए दरिया की हो धारा निर्मल जो ना समझे कि क्या हो उसका नसीब होगा ।

PRAN SHARMA said...

SUNDAR AUR SAHAJ BHAVABHIVYAKTI.

Vivek Jain said...

लाजवाब शेर
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

SAJAN.AAWARA said...

CHAR LINE OR JINDGI KI BAAT. . .
LAJWAAC SHER
JAI HIND JAI BHARAT