मंगलवार, 27 सितंबर 2011

अपशगुन...

अपशगुन...

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उस दिन तुम जा रहे थे
कई बार आवाज़ दी
कि तुम मुड़ो और
मैं हाथ हिला कर तुम्हें विदा करूँ,
लौटने पर तुम कितना नाराज़ हुए
जाते हुए को आवाज़ नहीं देते
अपशगुन होता है,
कितना भी ज़रूरी हो
न पुकारा करूँ तुम्हें !
देखो न
सच में अपशगुन हो गया
पर तुम्हारे लिए नहीं मेरे लिए,
सोचती हूँ
मेरे लिए अपशगुन क्यों हुआ?
तुमने तो कभी भी आवाज़ नहीं दी मुझे !
तुम उस दिन आये थे
अंतिम बार मिलने,
अलविदा कहने के बाद मुड़े नहीं
ज़रा देर को भी रुके नहीं,
जैसे हमेशा जाते हो
चले गए
जैसे कुछ हुआ हीं नहीं!
मैं जानती थी कि
तुम्हारे पास
मेरे लिए
कोई जगह नहीं,
फिर भी एक कोशिश थी
कि शायद...
जानती थी कि ये मुमकिन नहीं
फिर भी...
तुम मेरी ज़िन्दगी से जा रहे थे
कहीं और ज़िन्दगी बसाने,
मन किया कि तुमको आवाज़ दूँ
तुम रूक जाओ
शायद वापस आ जाओ,
पर
आवाज़ नहीं दे सकती थी
तुम्हारा अपशगुन हो जाता !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 27, 2011)

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17 टिप्‍पणियां:

mridula pradhan ने कहा…

ekdam dil ko cheer kar rakh diya......kyaa boloon.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सोच में तुम कितने ठोस थे और मैं ....... तभी तो तुमने जब जैसा चाहा कह दिया और चले गए

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

मर्मस्पर्शी रचना!!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…






आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और
शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

कविता बहुत अच्छी और भावपूर्ण है …

बधाई और आभार !!

सहज साहित्य ने कहा…

'अपशगुन' कविता के माध्यम से अनुराग का जीता-जागता रूप शब्दों की रेशमी डोरी में बाँध दिया है , जिसे न रोकते बनए न टोकते। जेन्नी जी की ये पंक्तियां एक तड़प सी छोड़ जाती हैंजानती थी कि ये मुमकिन नहीं
फिर भी...
तुम मेरी ज़िन्दगी से जा रहे थे
कहीं और ज़िन्दगी बसाने,
मन किया कि तुमको आवाज़ दूँ
तुम रूक जाओ
शायद वापस आ जाओ,
पर
आवाज़ नहीं दे सकती थी
तुम्हारा अपशगुन हो जाता !। स्नेह और सम्मान के साथ काम्बोज

***Punam*** ने कहा…

किसी का शगुन किसी के लिए अपशगुन
भी हो सकता है.....

मर्मस्पर्शी..........

प्रेम सरोवर ने कहा…

शबनम जी ,जब भी आपके पोस्ट पर आता हूँ न जाने क्यूं मन एक सहज आत्मीय भाव से भर जाता है । आपकी अभिव्यक्ति मन के अंदर रचे-बसे कोमल भावों को दोलायमान स्थिति में ला देते हैं । बहुत ही खूबसूरत अंदाज में पेश किया हुआ भाव अच्छा लगा । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

veerubhai ने कहा…

भावसागर को बांधती मनोविज्ञान की भावगंगा है यह रचना ,मानसिक कुन्हानसे को शब्द देती .

अभिषेक मिश्र ने कहा…

किसी और के अपशगुन को रोकने के लिए खुद का सैक्रिफाइस करना ! मगर जो अपना अपशगुन हो गया उसका परिमार्जन भी है क्या कोई !!! शायद कभी नहीं.....

अजय कुमार ने कहा…

एक अपशगुन रुका लेकिन दूसरा हो गया

Dr Varsha Singh ने कहा…

मन को छू लेने वाली भावपूर्ण रचना.....

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत सुन्दर शब्द संयोजन ...

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बेहतरीन अभिव्यक्ति!!!

Rajesh Kumari ने कहा…

vaah bahut khoob ek mithya visvaas ne dil ko rok liya.ek gahan prem ki abhivyakti.

Sunil Kumar ने कहा…

फिर भी एक कोशिश थी....
मन को छू लेने वाली भावपूर्ण रचना..

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) ने कहा…

isi tarah likhti rahiye....ham peechhe se nahin denge aavaaz..... apsakun ho jaayegaa naa....badhiya liyaa hai...badhaayi...