Monday, January 10, 2011

तुममें अपनी ज़िन्दगी...

तुममें अपनी ज़िन्दगी...

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सोचती हूँ
कैसे तय किया होगा तुमने
ज़िन्दगी का वो सफ़र
जब तन्हा ख़ुद में जी रहे थे तुम
और ख़ुद से हीं एक लड़ाई लड़ रहे थे !

जानती हूँ मैं
उस सफ़र की पीड़ा
और वाकिफ़ भी हूँ उस दर्द से
जब भीड़ में कोई तन्हा रह जाता है
और नहीं होता कोई अपना
जिससे बाँट सके ख़ुद को !

तुम्हारी हार
मैं नहीं सह सकती
और तुम
मेरी आँखों में आंसू,
चलो कोई नयी राह तलाशते हैं
साथ न सही दूर दूर हीं चलते हैं,
बीती बातें
मैं भी छोड़ देती हूँ
और तुम भी ख़ुद से
अलग कर दो अपना अतीत,
तुम मेरी आँखों में हँसी भरना
और मैं तुममें अपनी ज़िन्दगी...

__ जेन्नी शबनम __ ७. १. २०११

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10 comments:

Mukesh Kumar Sinha said...

dono agar ek dusre ki aankho me khushi dhundh len aur khushi chahen to kya kahne...:)

shandaar abhivyakti di.......

मनोज कुमार said...

इस रचना की स्पष्‍टता, गहराई और बारीक विश्‍लेषण प्रभावित करते हैं । बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
कविता - इन दिनों ..

mridula pradhan said...

wah.bahut sunder bhaw.

अनामिका की सदायें ...... said...

pyar ki nirmal bhaavnao se ot-prot sunder rachna.

***Punam*** said...

तुम्हारी हार
मैं नहीं सह सकती
और तुम
मेरी आँखों में आंसू,
चलो कोई नयी राह तलाशते हैं
साथ न सही दूर दूर हीं चलते हैं,
बीती बातें
मैं भी छोड़ देती हूँ
और तुम भी ख़ुद से
अलग कर दो अपना अतीत,
तुम मेरी आँखों में हँसी भरना
और मैं तुममें अपनी ज़िन्दगी...

सुंदर भाव..सुंदर अभिव्यक्ति..

"मेरे आंसू कहीं कमज़ोर न कर दें तुझको

मैंने हर कतरा छुपाया है पलकों में अब भी"

nilesh mathur said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति !

रश्मि प्रभा... said...

जानती हूँ मैं
उस सफ़र की पीड़ा
और वाकिफ़ भी हूँ उस दर्द से
जब भीड़ में कोई तन्हा रह जाता है
और नहीं होता कोई अपना
जिससे बाँट सके ख़ुद को !
yahi ehsaas jodta hai

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

अरुण चन्द्र रॉय said...

jenni ji prem kee gahan anubhuti aur abhivyakti hai apki yah kavita.. sundar.. komal komal..

Anonymous said...

,किसी की हार और किसी के आंसुओं को न सह पाने की बात फिर भी दूरी बनाये रखने की कोशिश ,भ्रमित करती है ये कविता|