Sunday, March 27, 2011

ऐ ज़िन्दगी...

ऐ ज़िन्दगी...

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तल्ख़ धूप कितना जलायेगी
अब तो बीत जाये, दिन बुरा,
रहम कर हमपे, ऐ ज़िन्दगी !

बाबस्ता नहीं कोई
दर्द बाँटें, किससे बता,
चुप हो जी ले, ऐ ज़िन्दगी !

दिन के उजाले में स्वप्न पले
ढल गई शाम, अब करें क्या,
किसका रस्ता देखें, ऐ ज़िन्दगी !

वो कहते हैं समंदर में प्यासे रह गए
नदी की तरफ, वो चले ही कब भला,
गिला किससे शिकवा क्यों, ऐ ज़िन्दगी !

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी,
समझें कैसे, उनकी मोहब्बत बता,
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी !

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2011)

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8 comments:

nilesh mathur said...

सुन्दर अभिव्यक्ति!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी,
समझें कैसे, उनकी मोहब्बत बता,
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी !
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वियोगी होगा पहला कवि,
हृदय से उपजा होगा गान!
निकल कर नयनों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान!
--
सुन्दर अभिव्यक्ति!

रश्मि प्रभा... said...

वो कहते हैं समंदर में प्यासे रह गए
नदी की तरफ, वो चले हीं कब भला,
गिला किससे शिकवा क्यों, ऐ ज़िन्दगी !
bahut hi badhiyaa

मनोज कुमार said...

सुंदर भावाभिव्यक्ति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी,
समझें कैसे, उनकी मोहब्बत बता,
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी !

बहुत खूब ...ज़िंदगी तो जीनी ही है फिर शिकवा शिकायत भी क्या ?

दर्शन कौर धनोए said...

तल्ख़ धूप कितना जलायेगी
अब तो बीत जाये, दिन बुरा,
रहम कर हमपे, ऐ ज़िन्दगी !

itni तल्ख़ ki bayaan nhi kar sakti ..

सहज साहित्य said...

वो कहते हैं समंदर में प्यासे रह गए
नदी की तरफ, वो चले हीं कब भला,
गिला किससे शिकवा क्यों, ऐ ज़िन्दगी !

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी,
समझें कैसे, उनकी मोहब्बत बता,
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी !
-ये पंक्तियाँ हृदय को आन्दोलित ।कर देती हैं । नदी की तरफ़ न आना ही प्यासे रह जाने का कारण है ।व्यथा को प्रस्तुत करने का अन्दाज़ बहुत मार्मिक है । जेन्नी जी हार्दिक बधाई

संजय भास्कर said...

बहुत खूब .. शिकवा शिकायत भी