तुकांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तुकांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 30 मई 2011

248. न मंज़िल न ठिकाना है (तुकांत)

न मंज़िल न ठिकाना है

*******

बड़ा अजब अफ़साना है, ज़माने से छुपाना है
है बेनाम-सा कोई नाता, यूँ ही अनाम निभाना है।  

सफ़र है बहुत कठिन, रस्ता भी अनजाना है
चलती रही तन्हा-तन्हा, न मंज़िल न ठिकाना है।  

धुँधला है अक्स पर, उसे आँखों में बसाना है
जो भी कह दे ये दुनिया, अब नहीं घबराना है।  

शमा से लिपटकर अब, बिगड़ा नसीब बनाना है
पलभर जल के शिद्दत से, परवाने-सा मर जाना है।  

इश्क़ में गुमनाम होकर, नया इतिहास रचाना है
रोज़ जन्म लेती है 'शब', क़िस्मत का खेल पुराना है।  

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2011)
______________________

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

231. ज़िन्दगी से छीना-झपटी ज़ारी है (तुकांत)

ज़िन्दगी से छीना-झपटी ज़ारी है

*******

पहली साँस से अंतिम साँस तक का, सफ़र जारी है
कौन मिला कौन बिछड़ा, ज़ेहन में तस्वीर सारी है

सपनों का पलना और फिर टूटना, ज़ख़्म तो है बहुत
किससे करूँ गिला शिकवा, सच मेरी तक़दीर हारी है

एक रोज़ मिला था कोई मुसाफ़िर, राहों में तन्हा-तन्हा
साथ चले कुछ रोज़ फिर कह गया, मेरी हर शय ख़ारी है 

नहीं इस मर्ज़ का इलाज़, बेकार गई दुआ तीमारदारी
थक गए सभी, अब कहते कि अल्लाह की वो प्यारी है 

ख़ुद से एक जंग छिड़ी, तय है कि फ़ैसला क्या होना
लहूलुहान फिर भी, ज़िन्दगी से छीना-झपटी ज़ारी है 

नहीं रुकती दुनिया वास्ते किसी के, सच मालूम है मुझे
शायद तक़दीर के खेल में हारना, मेरी ही सभी पारी है

जीने की ख़्वाहिश मिटती नहीं, नए ख्व़ाब हूँ सजाती
ज़ाहिर ही है हर पल होती, ज़िन्दगी से मारा-मारी है

इस जहाँ को कभी हुआ नहीं, उस जहाँ को हो दरकार
हर नाते तोड़ रही 'शब', यहाँ से जाने की पूरी तैयारी है

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2010)
_______________________

रविवार, 10 अप्रैल 2011

230. सपने (तुकांत)

सपने

*******

उम्मीद के सपने बार-बार आते हैं
न चाहें फिर भी आस जगाते हैं

चाह वही अभिलाषा भी वही
सपने हर बार बिखर जाते हैं

उल्लसित होता है मन हर सुबह
साँझ ढले टूटे सपने डराते हैं

आओ देखें कुछ ऐसे सपने
जागती आँखों को जो सुहाते हैं

'शब' कैसे रोके रोज़ आने से
सपने आँखों को बहुत भाते हैं

- जेन्नी शबनम (8. 4. 2011)
____________________

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

172. नज़्म को ठुकरा दिए वो / nazm ko thukra diye wo (तुकांत)

नज़्म को ठुकरा दिए वो

*******

सवाल-ए-वस्ल पर, मुस्कुरा दिए वो
हर बार हमें रुलाके, बिखरा दिए वो

शायरी में नज़्म कहके, सजाया हमें
अब इस नज़्म को ही, ठुकरा दिए वो

जाएँगे कहाँ, मालूम ही कब है हमको
गुज़रे एहसास को भी, बिसरा दिए वो

पूछने की इजाज़त, मिली ही कब हमें
कभी फ़ासला न सिमटे, पहरा दिए वो 

दर्द की बाबत, 'शब' से न पूछना कभी
वस्ल हो कि हिज्र, ज़ख़्म गहरा दिए वो 

- जेन्नी शबनम (7. 9. 2010)
_____________________

nazm ko thukra diye wo

*******

savaal-e-vasl par, muskura diye wo
har baar hamen rulake, bikhra diye wo.

shaayari mein nazm kahke, sajaaya hamen
ab is nazm ko hi, thukra diye wo.

jaayenge kahaan, maaloom hi kab hai hamako
guzre ehsaas ko bhi, bisra diye wo.

puchhne ki ijaazat, mili hi kab hamein
kabhi faasla na simte, pahra diye wo.

dard ki baabat, 'shab' se na puchhna kabhi
wasl ho ki hijra, zakhm gahra diye wo.

- Jenny Shabnam (7. 9. 2010)
________________________

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

115. दिल में चाँद इक उतरता है कोई (तुकांत) / dil mein chaand ik utarta hai koi (tukaant)

दिल में चाँद इक उतरता है कोई

*******

हर्फ़-हर्फ़ ज़िन्दगी लिखता है कोई
ख़्वाब हसीन रोज़ बुनता है कोई 

उसकी ज़िन्दगी में शामिल नहीं
पर सपनों में सदा रहता है कोई  

आज फिर कोई याद आया बहुत
दिल ही दिल में तड़पता है कोई  

कैसे कह दें कि वो है अजनबी
धड़कनों में जब बसता है कोई  

हो बस इक मुकम्मल मुलाक़ात
वक़्त से मिन्नत करता है कोई  

सफ़र की दास्तान अब न पूछो
ज़िन्दगी किस्तों में जीता है कोई  

बहुत की 'शब' ने चाँदनी की बातें
दिल में चाँद इक उतरता है कोई  

- जेन्नी शबनम (14. 1. 2010)
___________________________


dil mein chaand ik utarta hai koi

*******

harf-harf zindagi likhta hai koi
khwaab haseen roz bunta hai koi.

uski zindgi mein shaamil nahin
par sapnon mein sada rahta hai koi.

aaj fir koi yaad aaya bahut
dil hin dil mein tadapta hai koi.

kaise kah dein ki wo hai ajnabi
dhadkanon mein jab basta hai koi.

ho bas ik mukammal mulaakaat
waqt se minnat karta hai koi.

safar ki daastaan ab na puchho
zindagi kiston mein jita hai koi.

bahut kee 'shab' ne chaandni kee baatein
dil mein chaand ik utarta hai koi.

- Jenny Shabnam (14. 1. 2010)
_______________________________

रविवार, 10 जनवरी 2010

113. याद तुम्हें ज़रा नहीं (तुकांत) / yaad tumhein zaraa nahin (tukaant)

याद तुम्हें ज़रा नहीं

*******

एक शाम हो सिर्फ़ मेरी, चाह है कोई ख़ता नहीं
इश्क़ की कहानी तुमने कही, याद तुम्हें ज़रा नहीं  

अमावास का दीप सही, पर बताए कैसे दिशा मेरी
दूर है एक चाँद खिला, पर ध्रुव तारा-सा जला नहीं     

खो आई कुछ अपना, जब टूटा था तुम्हारा वादा
विश्वास की डोर जो टूटी, फिर कुछ अब बचा नहीं  

महज़ एक रात का नाता, उस सफ़र का वादा यही
हर तक़ाज़ा था तुम्हारा, मैंने किया कोई दग़ा नहीं  

तुम्हारा प्यार ज़्यादा, या मेरी तक़दीर कम पड़ी
रब की मर्ज़ी रब जाने, फैसला मेरा कभी रहा नहीं  

दर्द देकर कहते हो, आ जाओ सनम है जीवन सूना
सब अख़्तियार तुम ले बैठे, 'शब' ने कुछ कहा नहीं  

- जेन्नी शबनम (10. 1. 2010)
_______________________________

yaad tumhein zaraa nahin

*******

ek shaam ho sirf meri, chaah hai koi khataa nahin
ishq ki kahani tumne kahi, yaad tumhe zaraa nahin.

amaawas ka deep sahi, par bataye kaise dishaa meri
door ek chaand khila, par dhruv taaraa-sa jala nahin.

kho aayee kuchh apna, jab toota thaa tumhara wada
wishwaas ki dor jo tooti, fir kuchh ab bachaa nahin.

mahaz ek raat ka nata, us safar ka wada yahi
har takaza thaa tumhaara, maine kiya koi dagaa nahin.

tumhara pyar jyaada, ya meri takdeer kam padee
rab ki marzi rab jaane, faisla mera kabhi rahaa nahin.

dard dekar kahte ho, aa jao sanam hai jiwan soona
sab akhtiyaar tum le baithey, 'shab' ne kuchh kahaa nahin.

- Jenny Shabnam (10. 1. 2010)
____________________________________

रविवार, 8 नवंबर 2009

94. तुम कहाँ गए (तुकांत) / tum kahaan gaye (tukaant)

तुम कहाँ गए

*******

एक साँझ घिर आयी है मन पर
मेरी सुबह लेकर तुम कहाँ गए?

एक फूल खिला एक दीप जला
सब बुझाकर तुम कहाँ गए?

बीता रात का पहर भोर न हुई
सूरज छुपाकर तुम कहाँ गए?

चुभती है अब अपनी ही परछाईं
रौशनी दिखाकर तुम कहाँ गए?

तुम्हारी ज़िद न छूटेगा दामन
तन्हा छोड़कर तुम कहाँ गए?

वक़्त-ए-रुख़सत आकर मिल लो
सफ़र अधूरा कर तुम कहाँ गए?

'शब' की बस एक रात अपनी
वो रात लेकर तुम कहाँ गए?

- जेन्नी शबनम (7. 11. 2009)
______________________________

tum kahaan gaye

*******

ek saanjh ghir aayee hai mann par
meri subah lekar tum kahaan gaye?

ek phool khilaa ek deep jalaa
sab bujhaa kar tum kahaan gaye?

beetaa raat ka pahar bhor na huee
sooraj chhupaa kar tum kahaan gaye?

chubhtee hai ab apnee hin parchhayeen
raushanee dikhaa kar tum kahaan gaye?

tumhaari zidd na chhutegaa daaman
tanhaa chhod kar tum kahaan gaye?

waqt-ae-rukhsat aakar mil lo
safar adhuraa kar tum kahaan gaye?

'shab' kee bas ek raat apnee
wo raat lekar tum kahaan gaye?

- jenny shabnam (7. 11. 2009)
___________________________________

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

91. पैग़ाम चाँद को सुना जाना (तुकांत) / paighaam chaand ko suna jaanaa (tukaant)

पैग़ाम चाँद को सुना जाना

*******

चाँद खिले तो छत पर आ जाना, महूरत हमें भी बता जाना
पैग़ाम हम चाँद से पूछेंगे, अपना पैग़ाम चाँद को सुना जाना 

इबादत की वो पाक घड़ी, जब साथ एक युग हम जी आए
मुक़म्मल सफ़र उम्र भर का, वो पल मेरा हमें दिला जाना 

वक़्त के घाव थे बहुत, तुम्हारे ज़ख़्मों को हम कैसे छुपाएँगे
एक निशानी मेरी पेशानी पे, जो तुमने दिए वो मिटा जाना 

वक़्त ने दिए थे इतने ही लम्हे, वादा था कि बिछड़ जाना है
मिटने का दर्द हम सह लेंगे, अपनी दुनिया में हमें छुपा जाना 

न चाह कोई न माँग तुम्हारी, कमबख़्त ये दिल समझता नहीं
उस जहाँ में ढूँढ़ेंगे, मेरे अंतिम पल में अपनी छवि दिखा जाना 

हँसने की कसम देते हो सदा, इतने ज़ालिम क्यों हो प्रियतम
आज एक कसम है तुमको मेरी, हर कसम से हमें छुड़ा जाना 

तुम कृष्ण हो किसी राधा के, एक मीरा भी तुममे रहती है
देव अराध्य हो तुम मेरे, इस 'शब' को न तुम भुला जाना 

- जेन्नी शबनम (28. 10. 2009)
______________________________________

paighaam chaand ko suna jaana

*******

chaand khile to chhat par aa jaanaa, mahurat hamein bhi bata jaanaa,
paighaam hum chaand se puchhenge, apnaa paighaam chaand ko sunaa jaanaa.

ibaadat kee wo paak ghadee, jab saath ek yug hum jee aaye,
muqammal safar umra bhar ka, wo pal mera hamein dilaa jaanaa.

waqt ke ghaaw theye bahut, tumhaare zakhmon ko hum kaise chhupayenge,
ek nishaanee meree peshaani pe, jo tumne diye wo mita jaanaa.

waqt ne diye theye itne hin lamhe, waadaa thaa ki bichhad jaanaa hai,
mitne ka dard hum sah lenge, apnee duniya mein hamein chhupaa jaanaa.

na chaah koi na maang tumhaari, kambakht ye dil samajhta nahin,
us jahaan mein dhundhenge, mere antim pal mein apnee chhavi dikha jaanaa.

hansne kee kasam dete ho sadaa, itne zaalim kyu ho priyatam,
aaj ek kasam hai tumko meree, har kasam se hamein chhudaa jaanaa.

tum krishna ho kisi raadha ke, ek meera bhi tumamein rahtee hai,
dev araadhya ho tum mere, is 'shab' ko na tum bhula jaanaa.

- Jenny Shabnam (28. 10. 2009)
_______________________________________________

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

89. शब को दूर जाने दो (तुकांत) / shab ko door jaane do (tukaant)

शब को दूर जाने दो

*******

ज़िन्दगी को टूट जाने दो, कलम भी छूट जाने दो
उसको जाने का बहाना चाहिए, रूठा है रूठ जाने दो 

साझे एहसासों से बना था, कल मन का एक घरौंदा
अब कहता है मुझको, तसव्वुर से भी दूर जाने दो 

दस्तूर मालूम है उसे भी, उम्र की नादानियों की
फ़ासले उम्र के हों या मन के, भ्रम टूट जाने दो 

जितनी मोहब्बत की उसने, उतनी ही नफ़रत भी
कब किसका पलड़ा भारी, अब मुझे भूल जाने दो 

शिकवा बहुत किया है ज़िन्दगी से, अब न करेंगे
ग़म और मिले इससे पहले, ज़िन्दगी छूट जाने दो 

ख़्वाहिशें तो मिटी नहीं कभी, जिन्हें पाला हमने वर्षों
थम-सी गई है ज़िन्दगी, अब साँसों को टूट जाने दो 

रूह से नाता जोड़कर, जन्म दिए हम एक संतान देव
तुम्हें सौंपती हूँ उस अनाथ को, 'शब' को दूर जाने दो 

- जेन्नी शबनम (22. 10. 2009)
____________________________________________


shab ko door jaane do

*******

zindgi ko toot jaane do, kalam bhi chhoot jaane do
usko jaane ka bahaana chaahiye, rootha hai rooth jaane do.

saanjhe ehsaason se banaa thaa, kal mann ka gharaunda
ab kahtaa hai mujhko, tasauur se bhi door jaane do.

dastoor maaloom hai use bhi, umra kee naadaaniyon kee
faasle umra ke hon ya mann ke, bhrum toot jaane do.

jitnee mohabbat kee usne, utnee hi nafrat bhi
kab kiska paldaa bhaari, ab mujhe bhool jaane do.

shikwa bahut kiya hai zindagi se, ab na karenge
gham aur mile isase pahle, zindagi chhoot jaane do.

khwaahishen to kabhi mitee nahee, jinhein paalaa humne varshon
tham-see gayee hai zindagi, ab saanson ko toot jaane do.

rooh se naata jod kar, janm diye hum ek santaan dev
tumhein saunptee us anaath ko, 'shab' ko door jaane do.

- Jenny Shabnam (22. 10. 2009)
_____________________________________