Monday, June 20, 2011

मेरे मीत...

मेरे मीत...

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देखती हूँ तुम्हें
चाँद की काया पर,
हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूं तुम्हें
पाया है तुम्हें
चाँद के सीने पर!

तुम मेरे हो, और मेरे ईश भी,
तुम मेरे हो, और मेरे मीत भी!
तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया,
तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया!

कभी चाँद के दामन से
कुछ रौशनी उधार मांग लाई थी
और उससे तुम्हारी तस्वीर
उकेर दी थी
चाँद पर,
जब जी चाहता मिलूं तुमसे
देखती हूँ तुम्हें चाँद की काया पर!


__ जेन्नी शबनम __ 8 फ़रवरी, 2009
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7 comments:

sushma 'आहुति' said...

bhut khubsurat aur pyari rachna....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

देखती हूँ तुम्हें
चाँद की काया पर,
हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूं तुम्हें
पाया है तुम्हें
चाँद के सीने पर!..
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बहुत खूबसूरत रचना!

वीना said...

सुंदर भाव....

मनोज कुमार said...

कोमल मन की सुंदर भावाभिव्यक्ति!

Vivek Jain said...

बहुत ही सुंदर,
आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

SAJAN.AAWARA said...

BAHUT HI KHUBSURAT, LAJWAB KAVITA. BAHUT SE BHAV SAMETE HUYE HAI YE KAVITA. . . .
JAI HIND JAI BHARAT

सहज साहित्य said...

तुम मेरे हो, और मेरे ईश भी,
तुम मेरे हो, और मेरे मीत भी!
तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया,
तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया!
-मेरे होना ,मेरे ईश होना ,प्रिय की छवि में खुदा को पाना फिर उसमें खुद की तलाश करना ।प्रेम का यही स्वरूप शाश्वत है । उसे दायरे में बांधकर हम खुद सीमित होने को अभिशप्त हैं । चाँद से रौशनी उधार माँगकर उकेरा रूप्मिलने का आभास देता है ।पूरी कविता में एक अव्यक्त अपनापन समाया हुआ है ।